राजा और गड़रिया: एक साहसी निर्णय की कहानी
क्या कभी किसी के नुकसान में उसका भला छिपा हो सकता है? यह कहानी एक ऐसे गड़रिये की है जिसने राजा के अनमोल चित्र को नष्ट करके स्वयं राजा के प्राणों की रक्षा की।
कला में खोया राजा
प्राचीन काल में एक राजा को चित्रकारी का बहुत शौक था। एक बार वह एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर बैठकर प्रकृति का दृश्य बना रहा था। चित्र इतना सुंदर बना कि राजा आत्मविभोर हो गया। वह बार-बार चित्र को सुधारता और उसे अलग-अलग कोणों से देखने के लिए पीछे हटता। अपनी कला में वह इतना खो गया कि उसे होश ही नहीं रहा कि पीछे हटते-हटते वह पहाड़ी की खतरनाक ढलान के अंतिम छोर तक पहुँच गया है।
गड़रिये की बुद्धिमानी
पास ही एक लड़का अपनी भेड़ें चरा रहा था। उसने देखा कि राजा बस एक कदम दूर है और वह गहरी घाटी में गिर सकता है। यदि वह चिल्लाता, तो राजा हड़बड़ाकर गिर सकता था।
लड़के ने तुरंत अपनी लाठी उठाई और राजा के उस सुंदर चित्र को फाड़ डाला। चित्र को नष्ट होते देख राजा गुस्से से आगबबूला हो गया और झपटकर लड़के को पकड़ लिया। राजा ने गरजकर कहा, "मूर्ख! तूने मेरी मेहनत को क्यों नष्ट किया? मैं तुझे इसका दंड दूँगा!"
क्रोध का आभार में बदलना
लड़के ने नम्रता से कहा, "महाराज, पहले ज़रा पीछे मुड़कर देखें।" जैसे ही राजा ने पीछे देखा, उसके पैर काँपने लगे। वह खाई के बिल्कुल किनारे पर खड़ा था। उसे अहसास हुआ कि चित्र फटने की वजह से ही उसका ध्यान भटका और वह रुक गया, वरना उसकी मौत निश्चित थी।
राजा ने अपनी जान बचाने के लिए उस साधारण लड़के का धन्यवाद किया। उसकी वीरता और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता (Presence of Mind) को देखकर राजा उसे राजमहल ले गया। राजा की छत्रछाया में वह लड़का बड़ा हुआ और अपनी बुद्धिमानी के कारण आगे चलकर राज्य का प्रधानमंत्री बना।
कहानी की सीख (The Moral)
"अच्छाई का फल अच्छा ही होता है।"
भावार्थ: कभी-कभी दूसरों की जान या भलाई के लिए हमें कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। यदि नियत साफ हो, तो निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य अंततः सम्मान और सफलता ही दिलाता है।

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