गोपाल भार: तेल-भोज की महिमा और सास की चतुराई पर विजय
१. राजसभा में चिंता और गोपाल का कचौड़ी प्रेम
कृष्णनगर की राजसभा सजी हुई थी। महाराज कृष्णचंद्र सिंहासन पर विराजमान थे, लेकिन उनके सबसे प्रिय पात्र गोपाल भार का कहीं पता नहीं था। इस मौके का फायदा उठाते हुए मंत्री जी ने महाराज के कान भरने शुरू कर दिए। उन्होंने कहा, "महाराज, राजज्योतिषी से पूछिए कि कहीं गोपाल किसी मुसीबत में तो नहीं फंसा? वह आजकल खुद को राजा से कम नहीं समझने लगा है, तभी तो जब चाहे आता है।"
महाराज चिंतित हुए, क्योंकि गोपाल की सुरक्षा राज्य की सुरक्षा से जुड़ी थी। ज्योतिषी ने गणना की और बताया कि गोपाल को कोई खतरा नहीं है। असल में गोपाल उस समय नाड़ू की दुकान पर कचौड़ियाँ उड़ाने में व्यस्त था। जब नाड़ू ने उसे २० कचौड़ियों का हिसाब दिया, तो गोपाल ने ५ और मांगी। उसने कहा, "दो नहीं मांगनी चाहिए, अमंगल होता है, तू मुझे पांच ही दे।" कुल २५ कचौड़ियाँ खाकर उसने घोषणा की कि आज वह राजसभा नहीं जाएगा, बल्कि घर जाकर एक लंबी नींद लेगा। जाने से पहले उसने शाम के नाश्ते—समोसे, चॉप और पकौड़ों के लिए दो मुहरें भी पेशगी दे दीं।
२. मंत्री की जासूसी और 'साधु' का षड्यंत्र
जब राजसभा में खबर पहुंची कि गोपाल दिन-भर नाड़ू की दुकान पर बैठा रहता है, तो महाराज के आदेश पर मंत्री खुद जांच करने पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि गोपाल बड़े ठाठ से बैठा समोसे खा रहा है। मंत्री ने अपना रौब दिखाया, लेकिन नाड़ू ने उन्हें घास नहीं डाली और कहा कि गोपाल ही उसकी दुकान की 'लक्ष्मी' है।
मंत्री ने चिढ़कर बटा और घटा को बुलाया और उन्हें साधु का भेष धरकर गोपाल के घर भेजा। अगले दिन जब गोपाल टहलने निकला, तो 'साधु' गोपाल के घर पहुंचे। भोली-भाली पत्नी ने उन्हें जल-बताशा दिया। साधुओं ने भविष्यवाणी की, "बेटी, हम हिमालय से देख रहे हैं कि तुम्हारे पति की इस तेल-मसाले वाली खाने की आदत से तुम लोग एक दिन कंगाल हो जाओगे और रास्ते पर आ जाओगे!"
गोपाल जब घर लौटा और सब सुना, तो उसने उन साधुओं के जूतों को देखकर पहचान लिया कि ये और कोई नहीं बल्कि मंत्री के गुर्गे बटा और घटा हैं। उसने अपनी पत्नी को शांत किया और राजसभा में जाकर मंत्री को करारा जवाब दिया—"मंत्री जी, दूसरों के फटे में टांग न अड़ाएं। अगर कृष्णनगर में तेल कम पड़ जाए, तो बताइएगा, मेरे पेट से थोड़ा निकाल कर दे दूंगा!"
३. सास का आगमन और गृहयुद्ध
तेल-भोज की समस्या सुलझी ही थी कि गोपाल के घर उसकी सास का पदार्पण हुआ। हाथ तंग होने के कारण जब गोपाल तुरंत 'छेना' (मिठाई) नहीं ला पाया, तो सास ने उसे 'कंजूस दामाद' का खिताब दे दिया। वह अपने बेटे (गोपाल के साले) की दरियादिली के झूठे गुणगान करने लगीं।
गोपाल गुस्से में बाजार तो गया, लेकिन सास और पत्नी पर खीझ निकालते हुए वह जानबूझकर सड़ी-गली सब्जियां और अजीब से बैंगन ले आया। घर में महाभारत शुरू हो गई। सास ने कहा, "इस आदमी ने मेरी बेटी का जीना हराम कर दिया है!" उन्होंने जिद ठान ली कि वह अपनी बेटी को साथ ले जाएंगी। पत्नी भी मां की बातों में आकर मायके चली गई। गोपाल का भरा-पूरा घर उजाड़ हो गया।
४. ५०० मुहरों का दांव और मंत्री की हार
गोपाल अकेला पड़ गया और बिना खाए-पिए राजसभा में उदास बैठने लगा। मंत्री और राजवैद्य ने उसका खूब मजाक उड़ाया। इधर मंत्री ने सास को भड़का रखा था कि किसी भी कीमत पर गोपाल की पत्नी को वापस न भेजा जाए।
गोपाल ने एक चाल चली। उसे पता चला कि उसकी सास को तीनकड़ी दादा की एक बीघा जमीन पर बड़ी लालसा है, जिसकी कीमत ५०० मुहरें है। गोपाल ने चुपके से अपनी पत्नी के जरिए सास को ५०० मुहरें उधार दिलवा दीं, लेकिन शर्त यह रखी कि पैसा किसने दिया है, यह सास को पता न चले। जमीन खरीदी गई और जैसे ही काम पूरा हुआ, गोपाल लेनदार बनकर सास के सामने खड़ा हो गया।
५. अंतिम विजय और सुखद अंत
गोपाल को देखकर सास के हाथ-पांव फूल गए! ५०० मुहरें चुकाना उनके बस की बात नहीं थी। मंत्री ने फिर से आग लगाने की कोशिश की, लेकिन गोपाल ने अपना आखिरी पत्ता फेंका। उसने कहा, "सासु मां, मुझे आपसे पैसे नहीं चाहिए। बस आप अपनी बेटी को मेरे साथ वापस भेज दीजिए और यह नई जमीन मेरी पत्नी के नाम कर दीजिए, सारा हिसाब बराबर!"
लेनदार के चंगुल से बचने के लिए सास तुरंत मान गईं। गोपाल अपनी पत्नी और एक बीघा जमीन के कागजात लेकर हंसते हुए घर के लिए रवाना हो गया। चलते-चलते उसने मंत्री और सास की ओर देखकर कहा—"चाहे कोई कितना भी साधु बने या शैतानी करे, अगर अक्ल हो तो 'तेल और पानी' का मेल भी कराया जा सकता है!"

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