उत्सव की घोषणा और अपमान का घूँट
महाराज कृष्णचंद्र ने राज्य की जनता की भलाई के लिए दो नए बड़े तालाब खुदवाने का काम पूरा कर लिया था। दरबार में खुशी का माहौल था। गोपाल ने हंसते हुए प्रस्ताव दिया, "महाराज, इस शुभ अवसर पर एक भव्य भोज (दावत) तो बनता है!"
तभी कुटिल मंत्री ने तंज कसा, "गोपाल, तुम्हारा तो काम ही है बस खाना और सोना! तुम खुद तो दूसरों के टुकड़ों पर पलते हो, कभी किसी को खिलाने का दम रखते हो?" दरबारियों के सामने इस अपमान से गोपाल का चेहरा लाल हो गया। उसने चुनौती स्वीकार की और कहा, "समय आने पर देख लेना मंत्री जी, मैं पूरे राज्य को जी-भरकर खिलाऊंगा!"
गोपाल की दरियादिली और 'पेट का पेंच'
अपनी बात साबित करने के लिए गोपाल ने अपने घर पर नाती-पोतों और पड़ोसियों के लिए रोज दावत शुरू कर दी। उसकी पत्नी (গিন্নি) परेशान थी कि इतना पैसा कहाँ से आएगा, लेकिन गोपाल बस एक ही बात कहता, "पैसा तो आता-जाता है, लेकिन मान-सम्मान और संबंध हमेशा रहते हैं।"
लगातार कई दिनों तक मसालेदार मछली का झोल और गरिष्ठ भोजन करने के कारण गोपाल की तबीयत बिगड़ गई। उसका पेट खराब हो गया और उसे दिन में पच्चीसों बार 'बाहर' भागना पड़ा।
मंत्री का जहरीला षड्यंत्र
जब गोपाल की पत्नी राजवैद्य (सरकारी डॉक्टर) के पास जा रही थी, तो रास्ते में मंत्री मिल गया। मंत्री ने सोचा, "गोपाल को रास्ते से हटाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।" उसने राजवैद्य को लालच दिया और डराकर एक ऐसा 'पाचन' (काढ़ा) तैयार करवाया जो बीमारी ठीक करने के बजाय इंसान को धीरे-धीरे मौत के करीब ले जाए।
मंत्री खुद वह दवा लेकर गोपाल के घर गया और बड़े प्यार से बोला, "गोपाल, मैं भले ही तुमसे झगड़ता हूँ, पर मैं तुमसे प्यार भी बहुत करता हूँ। यह दवा लो, तुरंत ठीक हो जाओगे।"
वैज्ञानिक की जाँच और गोपाल का 'मृत्यु नाटक'
गोपाल का मित्र वैज्ञानिक जब उसे देखने आया, तो उसने उस दवा की जाँच की। वैज्ञानिक चौंक गया— "गोपाल! यह दवा नहीं, धीमा जहर है! इसे पीते तो तुम दो दिन में परलोक सिधार जाते।"
गोपाल समझ गया कि यह मंत्री की चाल है। उसने एक मास्टर प्लान बनाया। पूरे राज्य में खबर फैला दी गई कि "गोपाल भाड़ की मृत्यु हो गई है।" एक फर्जी पत्र तैयार किया गया जिसमें लिखा था:
"मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह-संस्कार सिर्फ मेरा मित्र वैज्ञानिक करे और कोई भी मेरी चिता के पास न आए।"
मंत्री यह सुनकर खुशी से फूला नहीं समाया। अपने पापों का प्रायश्चित करने और अपनी महानता दिखाने के लिए उसने गोपाल के नाम पर एक विशाल 'श्राद्ध भोज' का आयोजन किया।
दावत में 'भूत' का आगमन
भोज के दिन, एक बूढ़ा व्यक्ति (जो असल में छद्म वेश में गोपाल था) दावत में पहुँचा। वह इतना खाने लगा कि पाँच हांडी दही और कई बालूशाही अकेले चट कर गया। जब खाना कम पड़ने लगा, तो मंत्री भड़क गया— "अरे ओ बूढ़े! तू है कौन? इतना तो इंसान नहीं, राक्षस खाता है!"
तभी गोपाल ने अपना भेष उतार दिया। मंत्री को लगा कि गोपाल का भूत सामने खड़ा है। गोपाल दहाड़ा, "मंत्री! तुमने और राजवैद्य ने मिलकर मुझे जहर दिया था! अब मैं तुम्हें जिंदा चबा जाऊँगा!"
डर के मारे मंत्री महाराज के पैरों में गिर पड़ा और सबके सामने अपना जुर्म कबूल कर लिया— "महाराज! मुझे माफ कर दीजिए, मैंने ही राजवैद्य के साथ मिलकर गोपाल को मारने की कोशिश की थी!"

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