सर्दियों की सुबह और जलेबी का स्वाद
सर्दियों का मौसम था और पाठशाला में अंग्रेजी नए साल की छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं। गोपाल भार का पोता बहुत खुश था और अपने दादा की उंगली पकड़कर बाजार घूमने निकला था। बाजार में चारों तरफ रौनक थी। हलवाई की दुकान पर कड़ाही में छनती हुई गरमा-गरम जलेबियों की महक ने बच्चे का मन मोह लिया।
"दादाजी! देखो सामने गरम जलेबियां! मुझे जलेबी खानी है," पोते ने जिद की। गोपाल ने हंसते हुए कहा, "ठीक है भाई, पहले जलेबी खाएंगे, फिर आगे बढ़ेंगे।"
दुकान पर जैसे ही वे पहुंचे, वहां एक अजीब सा दिखने वाला व्यक्ति बैठा था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, फटे हुए कपड़े थे और वह कुछ अजीब सी आवाजें निकाल रहा था— "जिजिली पीपी... जिजिली पीपी।"
गोपाल भार की पारखी नजरों ने उसे गौर से देखा। उन्हें लगा जैसे यह कोई जाना-पहचाना चेहरा है, जो वक्त की धूल में खो गया है। उन्होंने मन ही मन सोचा, 'अगर इसकी दाढ़ी साफ कर दी जाए, तो शायद हिसाब मिल जाए।' गोपाल उसे अपने साथ वैज्ञानिक के घर ले गए।
वैज्ञानिक की प्रयोगशाला और खोई हुई याददाश्त
वैज्ञानिक ने जब उस व्यक्ति को देखा, तो वह भी हैरान रह गया। गोपाल और वैज्ञानिक ने मिलकर उसकी दाढ़ी काटी और उसे साफ-सुथरा किया। चेहरा साफ होते ही दोनों के होश उड़ गए। यह कोई मामूली पागल नहीं, बल्कि महाराज का सबसे वफादार गुप्तचर 'नवजीवन' था, जो ठीक 5 साल पहले एक मिशन के दौरान गायब हो गया था।
वैज्ञानिक ने उसे अपनी खोजी हुई दवा पिलाई। धीरे-धीरे नवजीवन की आंखों में चमक लौटी। उसने गोपाल को पहचान लिया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने एक भयानक राज खोला:
"गोपाल दा! 5 साल पहले महाराज ने मुझे दक्षिण-पूर्व के एक गांव में लगान न मिलने की जांच करने भेजा था। वहां मैंने देखा कि अंग्रेज साहब (ब्रिटिश) गांव वालों को डरा-धमका रहे थे और उन्हें महाराज के खिलाफ भड़का रहे थे। जब अंग्रेजों को पता चला कि मैंने उनका सच जान लिया है, तो उन्होंने मेरे सिर पर लाठी से वार किया। मैं अपनी जान बचाकर भागा, लेकिन उस चोट के कारण मेरी याददाश्त चली गई।"
गोपाल ने तय किया कि इस राज का पर्दाफाश नए साल के दिन सबके सामने करेंगे।
मंत्री जी की 'अंग्रेजी' और नौकरों का बदला
उधर राजमहल में, महाराज कृष्णचंद्र नए साल पर अंग्रेजों के साथ व्यापारिक समझौता करने वाले थे। महाराज के मंत्री जी को इस बात का बहुत घमंड था कि उन्हें अंग्रेजी आती है। उन्होंने अपने दो नौकरों, बटा और घटा को महल सजाने का जिम्मा दिया।
मजाक-मजाक में मंत्री जी ने उन्हें कह दिया— "आई हेट यू!" (I Hate You)। मंत्री को लगा कि इसका मतलब "मैं तुम्हें प्यार करता हूँ" होता है। लेकिन जब नौकरों ने पंडित जी से इसका असली मतलब पूछा, तो उन्हें पता चला कि मंत्री जी उन्हें "घृणा" करते हैं।
गुस्से में आकर नौकरों ने राजमहल की सफाई और सजावट बीच में ही छोड़ दी और गायब हो गए। बेचारे मंत्री जी को महाराज के डर से खुद झाड़ू लगानी पड़ी और पूरी रात जागकर महल सजाना पड़ा। उनकी कमर और शरीर दर्द से टूट रहा था, लेकिन अंग्रेजों के सामने उन्हें मुस्कुराना पड़ रहा था।
राजदरबार का फैसला: अंग्रेजों की हार
नए साल की सुबह, राजदरबार फूलों से सजा हुआ था। अंग्रेज अधिकारी (साहब) और नवाब बहादुर वहां पहुंच चुके थे। अंग्रेज बहुत खुश थे कि आज महाराज व्यापार के कागजों पर दस्तखत करेंगे, जिससे उन्हें राज्य में लूटपाट की खुली छूट मिल जाएगी।
तभी गोपाल भार ने दरबार में प्रवेश किया। उनके पीछे-पीछे नवजीवन खड़ा था।
- धमाका: गोपाल ने सबके सामने नवजीवन को पेश किया। नवजीवन ने गरजते हुए कहा, "महाराज! ये अंग्रेज मित्र नहीं, गद्दार हैं! इन्होंने 5 साल से हमारे एक गांव को कब्जा रखा है और वहां का लगान खुद खा रहे हैं। इन्होंने ही मुझे जान से मारने की कोशिश की थी!"
- नवाब का गुस्सा: नवाब बहादुर यह सुनकर आगबबूला हो गए। उन्होंने अंग्रेजों को लताड़ते हुए कहा, "मेरी अनुमति के बिना इतना बड़ा अपराध? कृष्णनगर हमारा हिस्सा है!"
- सजा: महाराज कृष्णचंद्र ने तुरंत आदेश दिया— "व्यापारिक समझौता रद्द! इन अंग्रेजों को तब तक नहीं छोड़ा जाएगा, जब तक ये पिछले 5 साल का पूरा लगान और जुर्माना नहीं भर देते।"
अंग्रेज जो 'हैप्पी न्यू ईयर' कहने आए थे, वे गिड़गिड़ाने लगे— "प्लीज महाराज! हमें माफ कर दीजिए, हम सारा पैसा लौटा देंगे।"
उपसंहार: एक नई शुरुआत
अंग्रेजों की सारी हेकड़ी निकल गई। मंत्री जी की अंग्रेजी धरी की धरी रह गई। महाराज ने गोपाल भार और वैज्ञानिक की बहुत तारीफ की। नवजीवन को उसका पुराना ओहदा वापस मिल गया।
गोपाल भार ने हंसते हुए कहा, "महाराज, इस साल तो 'नववर्ष' के साथ-साथ 'नवजीवन' भी वापस आ गया है। अब राज्य में सुख और शांति होगी।" पूरे दरबार में हंसी की लहर दौड़ गई और सभी ने मिलकर नए साल का जश्न मनाया।

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