पाँच मटर के दाने: एक नन्हा वादा और अटूट विश्वास
पाँच मटर के दाने: एक नन्हा वादा और अटूट विश्वास
एक हरी-भरी फली के रेशमी बिस्तर पर पाँच मटर के दाने साथ रहते थे। वे एक-दूसरे के बहुत करीब थे, लेकिन उनकी सोच और सपने बिल्कुल अलग थे। दिन भर वे फली के अंधेरे में सुकून से सोते, पर जैसे ही रात होती, उनकी दुनिया संगीत से भर जाती।
जब चाँद आधा होता, तो वह चांदी के तारों जैसी वीणा बजाता, और जब वह पूरा होता, तो आसमान में बादलों के नगाड़े (ड्रम) बजने लगते।
- पहला मटर बड़ा जोशीला था, उसे नगाड़ों की थाप पर नाचना पसंद था।
- दूसरा शांतिप्रिय था।
- तीसरे को वीणा की मधुर धुन भाती थी।
- चौथा बहुत आलसी था, उसे बस "मजनी लाइफ" यानी बेफ़िक्र होकर सोना पसंद था।
- पर पाँचवाँ मटर, जो सबसे छोटा था, वह सबसे अलग था। उसे संगीत की हर विधा से प्यार था—चाहे वह मंजीरा हो, वीणा या ड्रम। उसे हर चीज़ में खुशी ढूंढना आता था।
फली का टूटना और गुलेल का सफर
वक्त बीता और फली तंग होने लगी। एक दिन अचानक प्रकाश की एक तेज़ किरण अंदर आई—प्रकृति ने अपना करिश्मा दिखाया था, फली फट गई थी। सभी मटर डरे हुए थे, पर साथ ही बाहर की रंग-बिरंगी दुनिया देखने को बेताब भी थे।
तभी एक लड़के ने उन्हें उठा लिया। उसने एक-एक करके चारों बड़े मटरों को अपनी गुलेल से आसमान में उड़ा दिया। कोई बादलों में खो गया, कोई नाली में गिरा, और कोई बस सोने के लिए आरामदायक कोना ढूंढने लगा।
लेकिन जब पाँचवें नन्हे मटर की बारी आई, तो उसने मन ही मन प्रार्थना की— "हे ईश्वर, मुझे ऐसी जगह ले चलो जहाँ मैं किसी के काम आ सकूँ।"
एक उदास कमरा और एक बीमार बच्ची
वह नन्हा मटर उड़कर एक पुरानी खिड़की की दराज में जा गिरा। उस खिड़की के ठीक अंदर एक बीमार बच्ची अपने बिस्तर पर लेटी थी। बुखार के कारण वह बहुत कमज़ोर हो गई थी और कुछ भी खाना नहीं चाहती थी। उसकी माँ असहाय होकर भगवान से उसकी सलामती की दुआ माँग रही थी।
नन्हे मटर का दिल पसीज गया। उस रात जब आसमान में चाँद का ड्रम बजा, तो मटर ने हिम्मत जुटाकर बच्ची से बात की।
बच्ची: "कौन है वहाँ? क्या मैंने अभी संगीत सुना?" मटर: "यह मैं हूँ, तुम्हारी खिड़की पर बैठा एक मटर। क्या तुम चाँद के नगाड़ों की आवाज़ सुन पा रही हो?"
बच्ची हैरान थी। मटर ने उसे समझाया कि इस दुनिया में सब कुछ मुमकिन है, बस ध्यान से सुनने और विश्वास करने की ज़रूरत है। उसने बच्ची से एक वादा किया— "अगर मैं मिट्टी और धूल में रहकर खुद को बदल सकता हूँ, तो तुम भी अपनी बीमारी को हरा सकती हो। बस हार मत मानना।"
संघर्ष और पुनर्जन्म
दिन बीतते गए। नन्हे मटर के लिए बाहर की दुनिया आसान नहीं थी। कड़ाके की ठंड पड़ी, फिर बर्फ गिरी, पर उसने हार नहीं मानी। उसने खुद को धूल और बर्फ की चादर में लपेटे रखा ताकि वह अपनी जड़ों को मज़बूत कर सके।
उधर बच्ची के मन में भी एक उम्मीद जगी। वह रोज़ सुबह खिड़की की ओर देखती। एक सुबह, चमत्कार हुआ। उस नन्हे, सूखे से दिखने वाले मटर के दाने से एक कोमल अंकुर फूटा था।
बच्ची की आँखों में चमक आ गई। उसने अपनी माँ से कहा, "माँ, देखो! अगर वह छोटा सा मटर ज़िंदा रहने के लिए इतनी मेहनत कर सकता है, तो मैं भी ठीक हो सकती हूँ।"
एक नई सुबह
देखते ही देखते वह अंकुर एक मज़बूत पौधे में बदल गया। उसमें सुंदर फूल खिले और शाखाएँ खिड़की के अंदर तक आने लगीं। बच्ची अब स्वस्थ थी। वह बिस्तर से उठकर खिड़की तक आई और उस नन्हे पौधे को सहलाया।
माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे। एक छोटे से मटर ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर एक ज़िंदगी को नई उम्मीद दी थी।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
Hindi: दूसरों का भला करने की इच्छा रखने वाले को ईश्वर स्वयं शक्ति प्रदान करता है। विश्वास में वह ताकत है जो बंजर धूल में भी फूल खिला सकती है और मौत के मुँह से ज़िंदगी छीन लाती है।

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