मजदूर राधा की मेहनत की कमाई जब जमींदार ने हड़प ली, तब स्वयं महादेव ने हस्तक्षेप कर उसे न्याय दिलाया। पढ़िए आस्था और ईमानदारी की जीत की यह मर्मस्पर्शी शिव कथा।
शिव का न्याय: आस्था की जीत
शाम का धुंधलका छा रहा था। दिनभर की हाड़-तोड़ मजदूरी के बाद राधा थकी-हारी अपने घर लौट रही थी। थकान इतनी थी कि रास्ते में एक बरगद के पेड़ के नीचे वह सुस्ताने के लिए बैठ गई। अचानक उसकी नजर झाड़ियों के बीच पड़े एक पत्थर पर पड़ी, जिसका आकार शिवलिंग जैसा था।
राधा ने पास जाकर उसे सहलाया और सोचने लगी, "अरे! यह तो साक्षात महादेव का रूप है, पर यहाँ धूप और धूल में अकेले पड़े हैं। कोई इनकी सेवा करने वाला नहीं है। कल से मैं काम पर जाने से पहले रोज यहाँ आऊँगी। भोलेनाथ तो बहुत भोले हैं, अगर वे प्रसन्न हो गए तो शायद मेरी सूनी जिंदगी में भी खुशियों का कोई सवेरा हो जाए।"
अगली सुबह राधा जल्दी उठी, स्नान किया और लोटे में जल लेकर उसी शिवलिंग के पास पहुँची। उसने बड़े प्रेम से अभिषेक किया, कुछ जंगली फूल चढ़ाए और माथा टेककर अपने काम पर निकल गई।
राधा शकरपुर गाँव की एक अनाथ और स्वाभिमानी लड़की थी। गरीबी ने उसे बचपन से ही मेहनत करना सिखा दिया था। इन दिनों वह एक बड़े खेत में फसल कटाई का काम कर रही थी।
मेहनत और षडयंत्र
खेत में काम करते हुए राधा की सहेली कमला ने उससे पूछा, "राधा, यह कटाई तो कल खत्म हो जाएगी, फिर आगे का क्या सोचा है?"
राधा ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा, "कमला, भोलेनाथ ने हाथ दिए हैं तो काम भी वही देंगे। बस उन पर भरोसा है।"
कमला ने बताया, "मैंने सुना है जमींदार साहब अपनी नई हवेली बनवा रहे हैं, वहाँ मजदूरों की जरूरत है। मैं तो परसों जा रही हूँ, तू भी चल मेरे साथ।" राधा मान गई। काम पर जाने से पहले उसने शिवलिंग के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "प्रभु, आज नए काम के लिए जा रही हूँ, लाज रखना।"
जमींदार ने काम समझाया, "दो वक्त का खाना मिलेगा और रोज के 400 रुपये दिहाड़ी। पर याद रहे, काम में कोई चोरी नहीं चलेगी।" राधा ने पूरी ईमानदारी से ईंटें उठाईं, गारा मिलाया और भारी बोरियाँ ढोईं। वह खुश थी कि इस बार जो पैसे मिलेंगे, उससे वह अपनी झोपड़ी की टूटी छत ठीक करवाएगी और अपनी माँ की तरह सब्जी की रेहड़ी लगाएगी।
जमींदार का विश्वासघात
40 दिन पूरे हुए। राधा और कमला खुशी-खुशी अपनी मजदूरी लेने पहुँचीं। राधा के हिसाब से 16,000 रुपये बनते थे। लेकिन जमींदार का चेहरा बदला हुआ था।
जब राधा ने पैसे माँगे, तो वह गरजकर बोला, "पैसे? कैसे पैसे? मैंने तो सिर्फ खाने का वादा किया था। भरपेट खाना खिलाया है तुम्हें, अब भागो यहाँ से!"
राधा की आँखों में आँसू आ गए, "सरकार, आपने 400 रुपये रोज की बात कही थी। मेरी मेहनत की कमाई मत मारिए।" लेकिन जमींदार ने उन्हें धक्के देकर बाहर निकाल दिया।
राधा रात भर अपनी टूटी छत को देखती रही, जहाँ से बारिश का डर सता रहा था। उसने रोते हुए सोचा, "माँ कहती थी जिसका कोई नहीं होता, उसके ईश्वर होते हैं।" अगले दिन वह फिर शिवलिंग के पास पहुँची और फूट-फूटकर रोने लगी, "महादेव, मेरे साथ अन्याय हुआ है। मेरी मेहनत की कमाई मुझे दिला दो।"
अचानक एक शांत और भारी आवाज उसके कानों में गूँजी, "उठो पुत्री! तुम्हारी 40 दिन की भक्ति और मजदूरी, दोनों स्वीकार हुई। तुम्हारी हक की कमाई खुद चलकर तुम्हारे द्वार आएगी।"
महादेव का चमत्कार
उधर जमींदार अपनी तिजोरी में नोटों की गड्डियाँ गिन रहा था। तभी उसकी बेटी आई और पैसे मांगने लगी। जैसे ही जमींदार ने गड्डी निकाली, वह दंग रह गया—नोटों की जगह सफेद कागज के टुकड़े थे! उसने दूसरी तिजोरी खोली जहाँ सोने के गहने थे, पर वहाँ साँप लोट रहे थे!
जमींदार खौफ से कांपने लगा। तभी कमरे में एक तेज प्रकाश हुआ और उसे महादेव की छवि दिखी। एक गर्जना हुई, "दूसरों का हक मारकर कोई कभी सुखी नहीं रहा। क्या तुम्हें राधा और उन बेसहारा मजदूरों की आह सुनाई नहीं दी?"
जमींदार थर-थर कांपते हुए महादेव के चरणों में गिर पड़ा, "प्रभु, मुझे क्षमा कर दें! मुझसे बड़ा अपराध हो गया। मैं अभी सबका हिसाब चुकता करूँगा।"
महादेव ने आदेश दिया, "मजदूरों का हक दो और गाँव में लंगर लगवाओ ताकि कोई भूखा न रहे।"
खुशियों का सवेरा
अगले ही पल सब कुछ पहले जैसा हो गया। जमींदार ने राधा और कमला को बुलाकर ससम्मान उनकी मजदूरी दी और माफी माँगी। राधा ने अपनी छत ठीक करवाई और अपनी माँ की याद में सब्जी की रेहड़ी लगानी शुरू की।
अब राधा रोज सुबह सब्जी बेचने निकलने से पहले उसी शिवलिंग की पूजा करती है, एक ताजी सब्जी वहां अर्पित करती है और कहती है, "जय भोलेनाथ! बस अपनी कृपा बनाए रखना।" उसकी रेहड़ी पर अब बरकत ही बरकत है।

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