शहरी चूहा और देहाती चूहा | सादगी और शांति की अनमोल कहानी
शहरी चूहा और देहाती चूहा
एक बार एक शहरी चूहा अपने पुराने दोस्त से मिलने गाँव पहुँचा। शहर की चकाचौंध में रहने वाले उस चूहे को गाँव की सादगी रास नहीं आई। उसे हर जगह बदबू और गंदगी लगी।
गाँव का सत्कार
देहाती चूहा अपने दोस्त को देखकर बहुत खुश हुआ। उसने बड़े प्यार से खेत की ताजी शकरकंदी, शलगम और ताजा दूध परोसा। लेकिन शहरी चूहे ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "दोस्त! तुम यह बेस्वाद खाना कैसे खा लेते हो? यहाँ न सफाई है, न ही चमक-धमक। तुम मेरे साथ शहर चलो, मैं तुम्हें असली राजसी जीवन दिखाऊँगा।" देहाती चूहा शहर देखने के लालच में साथ चल पड़ा।
शहर की चकाचौंध और छिपा हुआ डर
शहर पहुँचकर देहाती चूहा दंग रह गया। ऊँची इमारतें और रोशनी! शहरी चूहा उसे एक आलीशान घर के डाइनिंग टेबल पर ले गया, जहाँ पास्ता, केक, पनीर और फलों का ढेर लगा था। देहाती चूहे ने सोचा, "वाह! यही तो असली ज़िंदगी है।"
लेकिन जैसे ही उसने पहला निवाला लिया, घर का नौकर डंडा लेकर उन्हें मारने दौड़ा। दोनों अपनी जान बचाकर एक तंग छेद में जा छिपे। देहाती चूहा बुरी तरह कांप रहा था।
असली आज़ादी
थोड़ी देर बाद जब वे दोबारा खाना खाने निकले, तो एक बड़ी मोटी बिल्ली ने उन पर हमला कर दिया। बाल-बाल बचकर भागते हुए देहाती चूहे ने रास्ते में एक लोहे का पिंजरा (Mouse Trap) देखा। जब उसे पता चला कि इसमें फँसने के बाद कोई आज़ाद नहीं हो सकता, तो उसका दिल बैठ गया।
उसने अपने शहरी दोस्त से कहा:
"मेरे प्यारे दोस्त, मुझे तुम्हारा यह ऐशो-आराम नहीं चाहिए। तुम्हें ये पकवान मुबारक हों, जिनके साथ हर पल मौत का साया चलता है। मुझे तो मेरा गाँव ही प्यारा है, जहाँ भले ही सादा खाना है, पर मैं चैन की नींद सो सकता हूँ।"
देहाती चूहा उसी वक्त अपना सामान बाँधकर गाँव लौट गया और अपनी पूरी ज़िंदगी सुकून और आज़ादी से बिताई।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
भय और संकट के साथ मिलने वाले राजसी सुख से कहीं बेहतर वह सादा जीवन है, जहाँ शांति और सुरक्षा हो। आज़ादी और सुकून ही सबसे बड़ा धन है।

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