बीरबल की खिचड़ी: जब कुतर्क को मिला करारा जवाब
क्या एक दीपक की रोशनी से तालाब का पानी गर्म हो सकता है? बादशाह अकबर के एक बेईमान अधिकारी ने जब अपनी हार छिपाने के लिए यह बहाना बनाया, तो बीरबल ने अपनी चतुराई से उसे ऐसा सबक सिखाया जिसे आज भी दुनिया 'बीरबल की खिचड़ी' के नाम से जानती है।
कठिन शर्त और अधिकारी की बेईमानी
एक कड़ाके की ठंड में एक गरीब आदमी ने अपनी गरीबी मिटाने के लिए अधिकारी की शर्त स्वीकार की— पूरी रात बर्फीले तालाब में खड़े रहना। वह अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण सुबह तक पानी में खड़ा रहा। लेकिन जब इनाम (50 अशर्फियाँ) माँगने की बारी आई, तो अधिकारी ने एक बेतुका कुतर्क दिया। उसने कहा, "पास के महल में एक दीपक जल रहा था, तुमने उसकी गर्मी से खुद को बचा लिया, इसलिए तुम शर्त हार गए।"
बीरबल का अनोखा विरोध
निराश गरीब आदमी जब बीरबल के पास पहुँचा, तो बीरबल ने उसे न्याय का आश्वासन दिया। अगले दिन बीरबल दरबार नहीं गए। जब बादशाह अकबर स्वयं उन्हें देखने पहुँचे, तो उन्होंने एक विचित्र नज़ारा देखा।
बीरबल ने ज़मीन पर आग जला रखी थी और उससे कई फीट ऊपर बाँसों के सहारे एक हँडि़या लटका दी थी। अकबर ने हँसते हुए पूछा— "बीरबल, क्या तुम पागल हो गए हो? इतनी दूर रखी हँडि़या में खिचड़ी कैसे पकेगी?"
न्याय की जीत
बीरबल ने शांत भाव से उत्तर दिया— "हुजूर, यदि एक मील दूर जल रहे दीपक की गर्मी से तालाब का पानी गर्म हो सकता है और एक इंसान बच सकता है, तो मेरी खिचड़ी भी ज़रूर पक जाएगी!"
अकबर को तुरंत माजरा समझ आ गया। उन्होंने अधिकारी की बेईमानी को पकड़ा और उसे फटकार लगाते हुए गरीब आदमी को उसका हक दिलवाया।
कहानी की सीख (The Moral)
"जैसे को तैसा।"
भावार्थ: जो लोग अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके दूसरों के साथ अन्याय करते हैं, उन्हें उन्हीं के तर्क से पराजित करना ही बुद्धिमानी है। न्याय के लिए कभी-कभी कड़वा आइना दिखाना ज़रूरी होता है।

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