बुद्धिचंद की बुद्धि का चमत्कार: धूर्त सेठ को मिला करारा जवाब
क्या किसी व्यक्ति के कपड़ों और जूतों के आधार पर कोई मुकदमा जीता जा सकता है? यह कहानी बुद्धिचंद और एक लालची सेठ लक्ष्मीनंदन की है, जहाँ सेठ ने घर हड़पने की साज़िश रची, लेकिन अपनी ही बेवकूफी का शिकार बन गया।
सेठ का षड्यंत्र और बुद्धिचंद की शर्तें
बुद्धिचंद ने अपनी बेटी की शादी के लिए लक्ष्मीनंदन से कुछ रुपये उधार लिए थे। वह पैसा लौटाने के लिए समय माँग रहा था, लेकिन सेठ की नज़र बुद्धिचंद के कीमती मकान पर थी। सेठ उसे ज़बरदस्ती अदालत ले जाना चाहता था ताकि वह मकान गिरवी रखने के कागज़ात पर हस्ताक्षर करवा सके।
बुद्धिचंद सेठ की चाल समझ गया। उसने अपनी लाचारी का बहाना बनाया और सेठ के सामने एक-एक करके माँगें रखीं:
- "मेरे पास अदालत जाने के लिए घोड़ा नहीं है।" सेठ ने अपना घोड़ा दे दिया।
- "मेरे पास पहनने को कपड़े नहीं हैं।" सेठ ने अपने कपड़े दे दिए।
- "मेरे पास पगड़ी और जूते भी नहीं हैं।" सेठ ने वे भी दे दिए।
अदालत का दृश्य और चतुर सवाल
जब दोनों न्यायाधीश के सामने पहुँचे, तो बुद्धिचंद ने बड़ी मासूमियत से कहा— "श्रीमान, ये सेठ जी पागल हो गए हैं। ये दुनिया की हर चीज़ को अपनी बताते हैं। आप खुद ही इनसे पूछ लीजिए।"
बुद्धिचंद ने एक-एक कर सवाल दागने शुरू किए:
"यह पगड़ी किसकी है?" सेठ चिल्लाया— "मेरी है!"
"ये कपड़े और जूते किसके हैं?" सेठ फिर चीखा— "मेरे हैं!"
"और जिस घोड़े पर मैं आया हूँ, वह किसका है?" सेठ ने आपा खोते हुए कहा— "वह भी मेरा है!"
न्याय और उपहास
अदालत में मौजूद लोग और न्यायाधीश ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। न्यायाधीश को लगा कि लक्ष्मीनंदन मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया है, जो सामने वाले के पहने हुए जूते और कपड़े तक को अपना बता रहा है। न्यायाधीश ने तुरंत मुकदमा खारिज कर दिया और सेठ को डाँटकर भगा दिया। इस प्रकार बुद्धिचंद ने अपनी चतुराई से न केवल अपना घर बचाया बल्कि सेठ की धूर्तता का अंत भी किया।
कहानी की सीख (The Moral)
"धूर्त के साथ धूर्तता से ही पेश आना चाहिए।"
भावार्थ: यदि कोई आपके साथ अन्याय करने के लिए जाल बुनता है, तो उसे उसी के जाल में फँसाना ही बुद्धिमानी है। कभी-कभी सीधेपन के बजाय 'टेढ़ी उँगली से घी निकालना' ज़रूरी होता है।

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