अंगूर खट्टे हैं: अपनी असफलता को छिपाने का बहाना
क्या आपने कभी किसी को अपनी हार छुपाने के लिए बहाने बनाते देखा है? यह कहानी एक ऐसी चतुर लोमड़ी की है जो अपनी नाकामयाबी को स्वीकार करने के बजाय अंगूरों में ही खोट निकाल देती है।
अंगूरों का बगीचा और लोमड़ी का लालच
दोपहर का समय था और सूरज की गर्मी से एक लोमड़ी का बुरा हाल था। वह बहुत भूखी थी और खाने की तलाश में भटक रही थी। अचानक, उसकी नज़र एक सुंदर अंगूर के बगीचे पर पड़ी। वहाँ बेलों पर पके हुए, रसीले और बड़े-बड़े अंगूरों के गुच्छे लटक रहे थे।
अंगूरों को देखकर लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया। उसने सोचा— "वाह! आज तो दावत हो जाएगी। ये अंगूर मेरी भूख और प्यास दोनों मिटा देंगे।"
नाकाम कोशिश और थकान
अंगूर के गुच्छे काफी ऊँचाई पर लटक रहे थे। लोमड़ी ने अपनी गर्दन ऊपर तानी और लपकने की कोशिश की, पर नाकाम रही। उसने फिर से कोशिश की, थोड़ा और ऊँचा उछली, लेकिन उसके हाथ कुछ न लगा।
हार न मानते हुए लोमड़ी ने बार-बार छलांग लगाई। वह इधर से उधर दौड़ती और पूरी ताकत लगाकर उछलती, पर अंगूरों तक पहुँच पाना उसके बस की बात नहीं थी। काफी देर तक पसीना बहाने और कोशिश करने के बाद वह बुरी तरह थककर चूर हो गई।
बहाना और विदाई
जब उसे यकीन हो गया कि वह किसी भी कीमत पर अंगूरों तक नहीं पहुँच सकती, तो उसने अपनी हार को एक अजीब अंदाज़ में छिपाया। उसने अपनी नाक सिकोड़ी और घमंड से गर्दन घुमाकर वहाँ से जाने लगी।
जाते-जाते उसने खुद से (और शायद हवाओं से) कहा— "अरे छोड़ो! मुझे ये अंगूर चाहिए ही नहीं। ये तो अभी कच्चे और खट्टे हैं। ऐसे खट्टे अंगूर खाने से तो अच्छा है कि भूखा ही रहा जाए!"
खुद को यह झूठी सांत्वना देकर वह लोमड़ी वहाँ से शान से चलती बनी।
कहानी की सीख (The Moral)
"अपनी असफलता को स्वीकार करने के बजाय उसमें कमियाँ निकालना कमज़ोर लोगों की निशानी है। जो चीज़ हम हासिल नहीं कर पाते, अक्सर हम उसे बुरा बताने लगते हैं।"

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