खरगोश और कछुआ: अहंकार की हार और धैर्य की जीत
क्या तेज़ दौड़ने वाला हमेशा जीतता है? यह कहानी हमें बताती है कि मंज़िल तक वह पहुँचता है जो रुकता नहीं है। आइए पढ़ते हैं खरगोश और कछुए की यह सदाबहार कहानी।
एक चुनौती और अहंकार
एक जंगल में एक खरगोश रहता था, जिसे अपनी तेज़ रफ़्तार पर बहुत घमंड था। वह अक्सर कछुए की धीमी चाल का मज़ाक उड़ाया करता था। एक दिन कछुए ने तंग आकर खरगोश से कहा— "क्यों न हम एक दौड़ की शर्त लगा लें? देखते हैं कौन पहले जंगल के उस पार विजय-रेखा (Finish Line) तक पहुँचता है।"
खरगोश ठठाकर हँसा और शर्त स्वीकार कर ली। उसे पूरा यकीन था कि वह पलक झपकते ही कछुए को हरा देगा।
खरगोश की बड़ी भूल
दौड़ शुरू हुई। खरगोश बिजली की गति से दौड़ा और कुछ ही मिनटों में कछुए से बहुत आगे निकल गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, कछुआ कहीं नज़र नहीं आ रहा था।
खरगोश के मन में अहंकार आ गया। उसने सोचा— "कछुआ तो बहुत धीरे चलता है, उसे यहाँ तक पहुँचने में घंटों लगेंगे। क्यों न मैं इस घने पेड़ की ठंडी छाँव में थोड़ा आराम कर लूँ? जब वह पास आएगा, तो मैं एक छलाँग लगाकर शर्त जीत लूँगा और उसकी खूब खिल्ली उड़ाऊंगा।"
खरगोश पेड़ के नीचे लेटा और ठंडी हवा के झोंकों ने उसे गहरी नींद में सुला दिया।
कछुए की निरंतरता
उधर कछुआ बिना रुके, धीमी लेकिन स्थिर चाल से चलता रहा। वह थका था, पर उसका लक्ष्य साफ़ था। वह पेड़ के पास से गुज़रा जहाँ खरगोश सो रहा था, लेकिन उसने आराम करने के बजाय अपनी यात्रा जारी रखी।
कछुआ धीरे-धीरे चलते हुए विजय-रेखा के करीब पहुँच गया।
अंजाम: पछतावा और जीत
जब अचानक खरगोश की आँख खुली, तो सूरज ढलने वाला था। वह घबराकर उठा और पूरी ताकत से विजय-रेखा की ओर दौड़ा। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। कछुआ पहले ही मंज़िल पर पहुँच चुका था और मुस्कुराते हुए उसका इंतज़ार कर रहा था।
घमंडी खरगोश शर्त हार चुका था और कछुए की मेहनत जीत चुकी थी।
कहानी की सीख (The Moral)
"धीमी और निरंतर चाल चलने वाला ही दौड़ जीतता है (Slow and steady wins the race)। धैर्य, लगन और बिना रुके काम करने वाले व्यक्ति को कोई नहीं हरा सकता।"

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