घड़े का गुस्सा और सफेद हाथी की चालाकी
चिलचिलाती धूप और तपती दोपहर ने आम जनजीवन को बेहाल कर रखा था, लेकिन कुमार नाम का कुम्हार आज बहुत खुश था। वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था क्योंकि उसके बनाए मिट्टी के बर्तन धूप में अच्छी तरह सूख रहे थे। लेकिन कुमार की खुशी के पीछे एक काला सच था—उसने अधिक मुनाफे के लालच में मिट्टी में मिलावट की थी। उसे पूरा भरोसा था कि सूखने के बाद कोई भी उसकी बेईमानी को पकड़ नहीं पाएगा।
उसी शाम, कुमार का पड़ोसी माही, जो पेशे से एक धोबी था, कपड़ों का एक भारी गट्ठर लेकर वहां से गुजर रहा था। अचानक माही का पैर एक गड्ढे में पड़ा और वह अपना संतुलन खोकर सीधे कुमार के बर्तनों के ढेर पर जा गिरा।
"धड़ाम!"
आवाज सुनते ही कुमार बाहर आया और मलबे को देखकर आगबबूला हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, "माही! तुमने जानबूझकर मेरा इतना बड़ा नुकसान किया है। तुम मेरी तरक्की से जलते हो!"
माही ने हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए कहा, "भाई, यह तो बस एक हादसा था। मैं तुम्हारा नुकसान भर दूंगा, तुम बस हिसाब बता दो।" पर कुमार के मन में तो बदले की आग सुलग रही थी। उसने हिसाब लेने के बजाय माही को सबक सिखाने की एक खतरनाक योजना बनाई।
बादशाह का दरबार और सफेद हाथी का झूठ
अगले दिन कुमार बादशाह अकबर के दरबार में पहुँचा। चापलूसी करते हुए उसने कहा, "जहाँपनाह! कल मेरा एक मित्र अंगोला राज्य से आया था। वह हमारे राज्य की सुंदरता देख हैरान था, पर उसने एक बात कही जिससे मेरा सिर शर्म से झुक गया।"
अकबर ने उत्सुकता से पूछा, "ऐसी क्या बात है?"
कुमार ने झूठ का जाल बुनते हुए कहा, "महाराज, उसने कहा कि अंगोला के हाथी दूध जैसे सफेद होते हैं, जबकि हमारे यहाँ के हाथी काले और मैले हैं। यदि हमारे हाथियों को किसी उम्दा धोबी से धुलवाया जाए, तो वे भी चमक उठेंगे।"
बादशाह को यह बात कुछ अजीब लगी, लेकिन उन्होंने आज्ञा दी कि हाथियों को साफ किया जाए। कुमार ने तुरंत मौका देखकर माही धोबी का नाम सुझा दिया।
बीरबल की एंट्री और पलटवार
बेचारा माही मुश्किल में पड़ गया। वह दिन भर हाथी को रगड़ता रहा, लेकिन हाथी भला रगड़ने से सफेद थोड़े ही होता! परेशान होकर माही रोने लगा। तभी वहां से बीरबल गुजर रहे थे। माही ने सारी बात बीरबल को बता दी।
बीरबल तुरंत समझ गए कि यह मामला हाथी का नहीं, बल्कि कुमार की पुरानी रंजिश का है। उन्होंने मुस्कुराते हुए माही के कान में एक योजना बताई।
अगले दिन माही दरबार पहुँचा और बोला, "हुजूर, हाथी बहुत बड़ा है और वह एक जगह टिकता नहीं है। यदि कुम्हार भाई एक ऐसा बड़ा मिट्टी का घड़ा बना दें जिसमें हाथी खड़ा हो सके, तो मैं उसे रगड़-रगड़ कर दूध जैसा सफेद कर दूँगा।"
अकबर ने कुमार को आदेश दिया कि दो दिन के भीतर एक विशाल घड़ा तैयार किया जाए।
बेईमानी का घड़ा और सच्चाई की जीत
दो दिन की कड़ी मेहनत के बाद कुमार ने एक विशाल घड़ा बनाया। पूरा दरबार और खुद बादशाह उस घड़े को देखने आए। जैसे ही माही ने हाथी को उस घड़े में पैर रखने के लिए कहा, हाथी का भारी पैर पड़ते ही वह घड़ा चकनाचूर हो गया।
बादशाह अकबर क्रोधित होकर चिल्लाए, "कुमार! यह कैसा कच्चा घड़ा बनाया है तुमने? इसमें जरूर कोई मिलावट है!"
कुमार हड़बड़ा गया, "महाराज... वो असल में..."
तभी बीरबल ने चुटकी लेते हुए कहा, "जहाँपनाह, शायद टिम्बकटू के हाथी थोड़े हल्के होते होंगे, जो वहां के घड़े नहीं टूटते। कुमार को दोबारा कोशिश करनी चाहिए और तब तक घड़ा बनाना चाहिए जब तक वह हाथी का वजन न सह ले।"
अब कुमार बुरी तरह फंस चुका था। वह जानता था कि मिलावटी मिट्टी से वह कभी ऐसा घड़ा नहीं बना पाएगा। हार मानकर वह बादशाह के पैरों में गिर पड़ा और बोला, "मुझे क्षमा करें महाराज! मैंने ईर्ष्या के कारण माही को फंसाने के लिए सफेद हाथी का झूठ बोला था। बर्तनों में मिलावट की बात भी सच है।"
बादशाह ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया क्योंकि वह उनके एक पुराने मित्र का पुत्र था, पर कुमार को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। बीरबल की चतुराई से माही की जान बच गई और कुमार का अहंकार टूटकर उसी के घड़े की तरह बिखर गया।

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