चतुर चित्रकार: जब सूझबूझ ने पलटा पासा
क्या किसी की सनक को उसकी भाषा में जवाब देकर सुलझाया जा सकता है? यह कहानी एक ऐसे चित्रकार की है जिसने अपनी कला से नहीं, बल्कि अपनी बुद्धिमानी से एक अमीर महिला की जिद को संतुष्ट किया।
एक सनकी बुढ़िया और कलाकार की मेहनत
एक बहुत ही अमीर बुढ़िया ने एक प्रसिद्ध चित्रकार से अपना पोर्ट्रेट (चित्र) बनाने का आग्रह किया। चित्रकार ने अपनी पूरी कला झोंक दी और कई दिनों की मेहनत के बाद एक जीवंत चित्र तैयार किया। जब बुढ़िया उसे देखने आई, तो वह अपने पालतू कुत्ते 'टामी' को भी साथ लाई थी।
बुढ़िया ने चित्र की परख करने के लिए उसे अपने कुत्ते के सामने रख दिया। जब कुत्ते ने चित्र में कोई रुचि नहीं दिखाई, तो बुढ़िया ने चित्रकार का अपमान करते हुए कहा— "यह चित्र बिल्कुल बेकार है! जब मेरा वफादार कुत्ता ही मुझे इसमें पहचान नहीं पा रहा, तो यह चित्र मेरा कैसे हुआ?"
चित्रकार की मनोवैज्ञानिक चाल
चित्रकार अनुभवी था। वह जानता था कि बहस करने से कुछ नहीं होगा, इसलिए उसने बड़ी विनम्रता से बुढ़िया को अगले दिन आने को कहा। उसने वादा किया कि वह चित्र को इतना "स्वाभाविक" बना देगा कि कुत्ता भी उसे पहचान लेगा।
अगले दिन जब बुढ़िया आई, तो कुत्ता चित्र को देखते ही पूँछ हिलाने लगा और उसे बड़े चाव से चाटने लगा। बुढ़िया यह देखकर गद्गद हो गई और उसने चित्रकार को मुँह माँगी कीमत देकर चित्र खरीद लिया।
पर्दे के पीछे का सच
बुढ़िया के जाने के बाद चित्रकार अपनी चतुराई पर मुस्कुरा उठा। वास्तव में उसने चित्र में एक रेखा भी नहीं बदली थी। उसने बस एक मसालेदार गोश्त (Meat) का टुकड़ा लेकर पूरे चित्र पर रगड़ दिया था। कुत्ते ने अपनी मालकिन को नहीं, बल्कि गोश्त की उस खुशबू को पहचाना था।
कहानी की सीख (The Moral)
"सूझबूझ और व्यावहारिक बुद्धि से काम लेने पर बिगड़ी हुई बात भी बन जाती है। कभी-कभी कठिन परिस्थितियों को शांत दिमाग और चतुराई से हल करना ही बेहतर होता है।"

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