टिड्डा और चींटी: आज की बचत, कल का सहारा
क्या आज का आनंद कल की मुसीबत बन सकता है? यह कहानी एक बेपरवाह टिड्डे और एक दूरदर्शी चींटी की है, जो हमें सिखाती है कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
मौज-मस्ती और मेहनत का सामना
गर्मियों के दिन थे। चारों ओर सुनहरी धूप खिली थी और प्रकृति खाने-पीने की चीज़ों से भरी हुई थी। एक टिड्डा पेट भर खाना खाकर बेफिक्र होकर गिटार बजाने और गीत गाने में मस्त था। उसे लग रहा था कि यह खुशियाँ कभी खत्म नहीं होंगी।
तभी उसने देखा कि चींटियों की एक टोली भारी मेहनत कर रही है। वे अपने वजन से भी भारी अनाज के दाने ढोकर अपने बिलों में ले जा रही थीं। टिड्डे ने अपनी दोस्त चींटी का मज़ाक उड़ाते हुए कहा— "अरे दोस्त, तुम सब कितनी लालची और कामचोर हो! इतना सुहाना मौसम है, आओ मेरे साथ नाचो-गाओ। तुम लोग तो भविष्य के डर में आज का मजा ही भूल गई हो।"
चींटी ने शांति से जवाब दिया— "भाई, हम बरसात के कठिन दिनों के लिए भोजन जुटा रही हैं। तुम भी कुछ बचा लो, वरना बाद में पछताओगे।" टिड्डा खिलखिलाकर हँसा और दोबारा गाने में मगन हो गया।
बदलता मौसम और भूख का संकट
कुछ ही समय बाद गर्मी बीत गई और भारी बारिश का मौसम शुरू हो गया। आसमान बादलों से घिर गया और हर तरफ पानी ही पानी भर गया। टिड्डे के लिए अब घास के मैदानों में खाना ढूँढना नामुमकिन हो गया। उसका गाना बंद हो गया और अब वह भूख से तड़पने लगा।
जब उसे लगा कि वह अब जीवित नहीं बचेगा, तो उसे अपनी दोस्त चींटी की याद आई।
बंद दरवाजा और कड़वा सबक
कांपते हुए टिड्डा चींटी के घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा— "चींटी बहन, मुझे कुछ खाने को दे दो, मैं भूख से मर रहा हूँ। मुझ पर दया करो!"
चींटी ने दरवाजा खोला और गंभीरता से कहा— "याद करो टिड्डे भाई, जब हम मेहनत कर रही थीं, तब तुम हमारा मजाक उड़ा रहे थे। तब तुम गाने में मगन थे, तो अब इस बरसात में कहीं जाकर नाचो। जो समय का सम्मान नहीं करता, समय भी उसका साथ नहीं देता।" यह कहकर चींटी ने दरवाजा बंद कर दिया।
टिड्डे को समझ आ गया था कि आलस्य और लापरवाही की कीमत कितनी भारी होती है।
कहानी की सीख (The Moral)
"आज की बचत ही कल काम आती है। जो व्यक्ति सुख के समय में भविष्य की चिंता नहीं करता, उसे दुख के समय में पछताना पड़ता है। आलस्य सफलता का सबसे बड़ा शत्रु है।"

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