The Ass and the Statue: A Lesson on False Pride


 "गधा और मूर्ति - जब गधे ने लोगों की श्रद्धा को अपनी प्रशंसा समझ लिया, तो उसे क्या सबक मिला? पढ़िए यह प्रसिद्ध शिक्षाप्रद कहानी।"

गधा और मूर्ति: झूठे सम्मान का अहंकार

क्या कभी आपने दूसरों को मिलने वाले सम्मान को अपना समझकर गलती की है? यह कहानी एक ऐसे मूर्ख गधे की है, जिसने लोगों की भक्ति को अपनी लोकप्रियता समझ लिया और भारी भूल कर बैठा।

सुंदर मूर्ति और गधे का सफर

एक कुशल मूर्तिकार ने भगवान की एक अत्यंत मनमोहक और भव्य मूर्ति तैयार की। उस मूर्ति को शहर के एक बड़े सेठ के पास पहुँचाना था। मूर्तिकार ने इसके लिए एक गधा किराए पर लिया और मूर्ति को उसकी पीठ पर सावधानी से रख दिया।

जैसे ही मूर्तिकार गधे को लेकर रास्ते से गुज़रा, लोग उस अद्भुत मूर्ति को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। जहाँ से भी गधा गुज़रता, लोग रुक जाते, श्रद्धा से सिर झुकाते और मूर्ति की सुंदरता की प्रशंसा करते। कुछ श्रद्धालु तो मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम भी करने लगे।

मूर्खता और झूठा घमंड

गधा यह सब देख रहा था। उसे लगा कि लोग मूर्ति को नहीं, बल्कि उसे (गधे को) प्रणाम कर रहे हैं और उसकी सुंदरता की तारीफ कर रहे हैं। इस विचार ने गधे के मन में अहंकार भर दिया। वह खुद को कोई बहुत बड़ा देवता या महत्वपूर्ण जीव समझने लगा।

अचानक, गधा सड़क के बीचों-बीच अकड़कर खड़ा हो गया। उसने आगे बढ़ने से मना कर दिया और अपनी 'लोकप्रियता' का जश्न मनाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से रेंकने लगा। मूर्तिकार ने उसे धक्का दिया, पुचकारा और चलने का इशारा किया, लेकिन घमंडी गधे ने एक न सुनी। उसे लगा कि अब उसे किसी की बात मानने की ज़रूरत नहीं है।

अहंकार का अंत और कड़ा सबक

मूर्तिकार को ग्राहक के पास समय पर पहुँचना था। जब पुचकारने से काम नहीं बना, तो उसने एक मज़बूत डंडा उठाया और गधे की जमकर धुनाई कर दी। डंडे पड़ते ही गधे का सारा 'देवत्व' हवा हो गया।

उसे तुरंत अहसास हुआ कि लोग उसे नहीं, बल्कि उसकी पीठ पर रखी भगवान की मूर्ति को सम्मान दे रहे थे। दर्द और अपमान के साथ गधे का होश ठिकाने आया और वह चुपचाप नीचा सिर करके चलने लगा।


कहानी की सीख (The Moral)

"समझदार के लिए इशारा काफी है, लेकिन मूर्खों को केवल डंडे (कठोर व्यवहार) से ही समझ आता है। दूसरों को मिलने वाले सम्मान को अपना मान लेना सबसे बड़ी मूर्खता है।"

🌟 कहानी का अंत
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