"लकड़हारा और देवदूत - क्या आपने ईमानदारी की यह महान कहानी पढ़ी है? जानिए कैसे एक गरीब लकड़हारे ने सोने की कुल्हाड़ी को मना कर दिया।"
लकड़हारा और देवदूत: ईमानदारी का अनमोल इनाम
क्या कोई अपनी गरीबी में भी सोने-चाँदी जैसी कीमती चीज़ों को ठुकरा सकता है? यह कहानी एक ऐसे लकड़हारे की है जिसने अपनी सच्चाई से एक देवदूत का दिल जीत लिया।
एक दुर्घटना और लकड़हारे का दुख
पुराने समय की बात है, एक अत्यंत गरीब लेकिन मेहनती लकड़हारा नदी के किनारे एक पेड़ की सूखी टहनियाँ काट रहा था। अचानक, उसके हाथ से कुल्हाड़ी फिसल गई और गहरे पानी में जा गिरी।
नदी का बहाव तेज़ था और पानी गहरा। लकड़हारे के पास वही एक कुल्हाड़ी थी जिससे वह अपना गुज़ारा करता था। अपनी आजीविका का एकमात्र साधन खो जाने पर वह पेड़ के नीचे बैठकर उदास हो गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
देवदूत का आगमन और परीक्षा
तभी वहाँ से एक देवदूत गुज़रे। लकड़हारे को इतना दुखी देख उन्हें उस पर दया आ गई। देवदूत ने कहा, "हे नेक इंसान! तुम दुखी क्यों हो? मैं तुम्हारी कुल्हाड़ी नदी से निकाल देता हूँ।"
देवदूत ने नदी के गहरे पानी में डुबकी लगाई और बाहर निकले तो उनके हाथ में चमकती हुई सोने की कुल्हाड़ी थी। उन्होंने पूछा, "क्या यह तुम्हारी है?" लकड़हारे ने नम्रता से कहा, "नहीं प्रभु! यह मेरी नहीं है।"
देवदूत ने फिर डुबकी लगाई और इस बार चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर आए। लकड़हारे ने फिर सिर हिलाया और कहा, "नहीं, यह भी मेरी नहीं है।"
सच्चाई की जीत
तीसरी बार जब देवदूत पानी से निकले, तो उनके हाथ में एक साधारण लोहे की पुरानी कुल्हाड़ी थी। उसे देखते ही लकड़हारा खुशी से उछल पड़ा और बोला, "हाँ! यही मेरी कुल्हाड़ी है।"
लकड़हारे की अद्भुत ईमानदारी और संतोष देखकर देवदूत अत्यंत प्रसन्न हुए। वे समझ गए कि यह व्यक्ति गरीब भले ही है, लेकिन इसका मन बहुत विशाल है।
पुरस्कार के रूप में देवदूत ने उसे उसकी लोहे की कुल्हाड़ी तो दी ही, साथ ही सोने और चाँदी की कुल्हाड़ियाँ भी उसे उपहार में दे दीं। लकड़हारे की ईमानदारी ने उसे रातों-रात अमीर बना दिया।
कहानी की सीख (The Moral)
"ईमानदारी सबसे अच्छी नीति (Honesty is the best policy) है। सत्य की राह पर चलने वालों को भले ही शुरू में कठिनाई हो, लेकिन उसका फल हमेशा मीठा और सुखद होता है।"
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