अमावस्या की रात और काली पूजा का संकल्प
महाराज कृष्णचंद्र के राज्य में इस बार काली पूजा बहुत ही धूमधाम से मनाने की तैयारी चल रही थी। महाराज ने आदेश दिया था कि पूरे राज्य को रोशनी से सजाया जाए और महाकाली की एक भव्य प्रतिमा बनाई जाए। लेकिन, इस उत्सव के बीच एक अजीब सी समस्या खड़ी हो गई थी।
दरबार के कुटिल मंत्री ने महाराज के कान भरने शुरू कर दिए। उसने कहा, "महाराज, राज्य के कुछ हिस्सों में लोग चोरी-छिपे खजाना खोद रहे हैं और अफवाह है कि वहां भूत-प्रेत का साया है।" असल में, मंत्री खुद खजाने के लालच में मिट्टी खुदाई करवा रहा था और उसे 'भूत' का नाम देकर लोगों को डरा रहा था।
गोपाल भार और 'मिट्टी खोदने वाला भूत'
जब महाराज ने गोपाल भार को बुलाकर इस समस्या का समाधान करने को कहा, तो गोपाल समझ गया कि दाल में कुछ काला है। उसी समय खबर आई कि जिस जगह काली पूजा के लिए मिट्टी लाई जानी है, वहां रात को डरावनी आवाजें आती हैं।
गोपाल ने अपनी योजना बनाई। उसने रात के अंधेरे में उस जगह का दौरा किया और देखा कि कुछ लोग चेहरा ढँककर चुपचाप खुदाई कर रहे हैं। गोपाल ने एक पेड़ के पीछे छिपकर जोर-जोर से हंसना और डरावनी आवाजें निकालना शुरू कर दिया— "कुरु कुरु... कुरु कुरु!" खदान में काम कर रहे लोग (जो मंत्री के आदमी थे) डर के मारे औजार छोड़कर भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि सच में कोई 'राज योग' वाला शक्तिशाली भूत आ गया है।
वैज्ञानिक का साथ और 'भूत' का पर्दाफाश
गोपाल अकेले नहीं था, उसने अपने वैज्ञानिक मित्र की मदद ली। वैज्ञानिक ने एक ऐसा रसायन (chemical) तैयार किया था जिससे हवा में अजीब सा धुआं और रोशनी पैदा होती थी। गोपाल ने इसका इस्तेमाल करके पूरे इलाके में ऐसा माहौल बना दिया कि मंत्री खुद डर गया।
एक दिन दरबार में मंत्री ने शेखी बघारते हुए कहा, "महाराज, मैं उस भूत को पकड़ लूँगा, बस मुझे कुछ और मुहरें (Gold coins) चाहिए।" गोपाल ने मुस्कुराते हुए कहा, "मंत्री जी, भूत तो आज रात खुद राजदरबार में आने वाला है अपना हिस्सा मांगने!"
काली पूजा का भव्य उत्सव और न्याय
काली पूजा की रात आई। पूरा राजमहल दीयों से जगमगा रहा था। तभी अचानक चारों तरफ धुआं फ़ैल गया और एक डरावनी आकृति (जो गोपाल ने वैज्ञानिक की मदद से बनाई थी) प्रकट हुई। वह आकृति चिल्लाई— "मेरा खजाना किसने चुराया? किसने मिट्टी खोदी?"
मंत्री इतना डर गया कि वह महाराज के पैरों में गिर पड़ा और चिल्लाने लगा, "मुझे बचाओ महाराज! मैंने ही खजाने के लालच में खुदाई करवाई थी! मैंने ही झूठ बोला था!"
जैसे ही मंत्री ने अपना जुर्म कबूला, रोशनी हुई और सामने गोपाल भार हंसता हुआ खड़ा था। महाराज कृष्णचंद्र जोर से हंस पड़े— "तो मंत्री जी, यही था आपका भूत?"
उपसंहार: महाभोज और खुशी
महाराज ने मंत्री को कड़ी चेतावनी दी और उसका सारा पद छीन लिया। गोपाल भार की वजह से काली पूजा का उत्सव बिना किसी बाधा के संपन्न हुआ। महाराज ने घोषणा की कि इस खुशी में पूरे राज्य के लिए महाभोज का आयोजन किया जाएगा।
गोपाल ने हंसते हुए कहा, "महाराज, पेट भरा हो तो भूत भी पास नहीं आता!" सबने मिलकर काली पूजा की खुशियाँ मनाईं और गोपाल की बुद्धिमानी की एक बार फिर से जय-जयकार हुई।

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