टेढ़ा-मेढ़ा पेड़: जब खामी ही बन गई जीवनदान
क्या आपने कभी अपनी किसी कमी को लेकर ईश्वर से शिकायत की है? यह कहानी एक ऐसे पेड़ की है जिसे अपना 'भद्दापन' पसंद नहीं था, लेकिन अंत में उसी ने उसकी जान बचाई।
सुंदरता की तुलना और उदासी
एक घने जंगल में एक बहुत ही अजीब और टेढ़ा-मेढ़ा पेड़ था। उसकी शाखाएं उलझी हुई थीं और तना इधर-उधर झुका हुआ था। उसके ठीक बगल में देवदार और साल के ऊँचे, सीधे और बेहद सुंदर पेड़ खड़े थे।
टेढ़ा पेड़ अक्सर उन सीधे पेड़ों को देखकर आहें भरता और कहता— "हे ईश्वर! तुमने मुझे ऐसा क्यों बनाया? ये सीधे पेड़ कितने राजसी और गौरवशाली लगते हैं, और एक मैं हूँ, जिसे देखकर लोग रास्ता बदल लेते हैं। मैं कितना अभागा और भद्दा हूँ!"
लकड़हारे की पसंद और हकीकत
एक दिन जंगल में एक लकड़हारा अपनी कुल्हाड़ी लेकर पहुँचा। उसकी नज़र सीधे और सुंदर पेड़ों पर पड़ी। उसने मन ही मन सोचा— "ये सीधे पेड़ इमारती लकड़ी के लिए बेहतरीन हैं। इनसे फर्नीचर और मकान बहुत अच्छे बनेंगे।"
उसने एक-एक करके उन सभी सुंदर पेड़ों को काट गिराया। जब वह टेढ़े पेड़ के पास पहुँचा, तो उसने उसे घृणा से देखा और कहा— "यह पेड़ तो बेकार है! इसकी लकड़ी किसी काम की नहीं, न इससे पटरे बनेंगे और न खंभे। इसे छोड़ देना ही बेहतर है।" और वह सीधे पेड़ों की लकड़ियाँ लेकर चला गया।
सच्चाई का अहसास
जब जंगल में शांति हुई, तब टेढ़े-मेढ़े पेड़ ने राहत की साँस ली। उसे समझ आया कि अगर वह भी उन पेड़ों की तरह सीधा और सुंदर होता, तो आज वह भी ज़मीन पर कटा हुआ पड़ा होता। उसने आसमान की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा— "हे ईश्वर! आपका धन्यवाद, जो आपने मुझे ऐसा बनाया। मेरे भद्देपन ने ही आज मुझे जीवनदान दिया है।"
कहानी की सीख (The Moral)
"तुम्हारे पास जो है, उसी में खुश रहो।"
भावार्थ: अक्सर हम दूसरों से अपनी तुलना करके दुखी होते हैं, लेकिन हमारी विशिष्टता (Unique qualities)—चाहे वे हमें कमी ही क्यों न लगें—किसी न किसी रूप में हमारे भले के लिए ही होती हैं। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

0 Comments