"साहूकार का बटुआ - पढ़िए एक चालाक साहूकार और ईमानदार किसान की यह रोचक कहानी। कैसे सरपंच के एक अनोखे फैसले ने झूठ की पोल खोल दी और लालची साहूकार को सबक सिखाया।"
साहूकार का बटुआ और सच्चा न्याय: एक प्रेरणादायक कहानी
क्या कभी चालाकी भारी पड़ सकती है? इस कहानी में जानिए कैसे एक लालची साहूकार को अपनी ही झूठी चाल के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा।
खोया हुआ बटुआ और लालच की घोषणा
एक समय की बात है, एक धनी लेकिन बेहद कंजूस साहूकार का बटुआ बाजार में कहीं गिर गया। बटुए में पूरे एक हजार रुपये थे। परेशान होकर साहूकार ने पूरे गाँव में ढिंढोरा पिटवा दिया कि— "जो कोई भी मेरा बटुआ लाकर देगा, उसे मैं 100 रुपये का नकद इनाम दूँगा।"
किसान की ईमानदारी
बटुआ एक गरीब और ईमानदार किसान को मिला था। जब उसने इनाम की घोषणा सुनी, तो वह तुरंत साहूकार के पास पहुँचा और बड़ी विनम्रता से वह बटुआ उसे सौंप दिया।
साहूकार ने झपटकर बटुआ लिया और पैसे गिनने लगा। पैसे पूरे एक हजार थे। अब साहूकार के मन में पाप आ गया। उसने सोचा— "पैसे तो मिल ही गए हैं, अब इस किसान को 100 रुपये क्यों दूँ? क्यों न कोई बहाना बनाया जाए!"
साहूकार की झूठी चाल
साहूकार ने अपनी आँखें तरेरीं और चिल्लाकर बोला— "अरे भाई! तू तो बड़ा तेज निकला। तूने इनाम की रकम पहले ही निकाल ली और अब मेरे सामने शरीफ बन रहा है?"
किसान हैरान रह गया और पूछा— "सेठजी, आप क्या कह रहे हैं? मैंने तो बटुआ खोला तक नहीं!"
साहूकार ने झूठ बोलते हुए कहा— "बकवास मत कर! इस बटुए में ग्यारह सौ रुपये थे, और अब इसमें केवल एक हजार ही हैं। इसका मतलब है कि तूने अपने 100 रुपये पहले ही ले लिए हैं। अब यहाँ से चलता बन!"
किसान को अपनी ईमानदारी पर लगे इस दाग से बहुत ठेस पहुँची। उसने हार नहीं मानी और कहा— "सेठजी, फैसला अब सरपंच ही करेंगे।"
सरपंच का अनोखा फैसला
मामला पंचायत में पहुँचा। सरपंच बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने दोनों की बातें सुनीं और तुरंत समझ गए कि साहूकार इनाम के पैसे बचाने के लिए झूठ बोल रहा है।
सरपंच ने साहूकार से दोबारा पूछा— "साहूकार जी, क्या आप कसम खाकर कहते हैं कि आपके बटुए में ग्यारह सौ रुपये ही थे?"
साहूकार ने सोचा कि अब तो पैसे बच गए, वह आत्मविश्वास से बोला— "हाँ सरपंच जी, मुझे पूरा यकीन है, उसमें ग्यारह सौ रुपये ही थे।"
सरपंच मुस्कुराए और बोले— "ठीक है! अगर आपके बटुए में 1100 रुपये थे और इस किसान को जो बटुआ मिला उसमें सिर्फ 1000 रुपये हैं, तो इसका मतलब यह बटुआ आपका है ही नहीं! यह बटुआ किसी और का होगा।"
सरपंच ने वह बटुआ किसान को सौंपते हुए कहा— "चूँकि इस बटुए का असली मालिक नहीं मिल रहा, इसलिए यह बटुआ और इसमें रखे पैसे इनाम के तौर पर इस ईमानदार किसान के हुए। साहूकार जी, जब आपका 1100 रुपये वाला बटुआ मिले, तब आप बताइएगा।"
साहूकार अपना सा मुँह लेकर रह गया। उसकी एक छोटी सी झूठ ने उसे 1000 रुपये का घाटा दे दिया।
कहानी की सीख (The Moral)
"झूठ और धोखाधड़ी का फल हमेशा कड़वा होता है। लालच में आकर दूसरों का हक मारने वाले को अपनी ही चाल का भारी हर्जाना भरना पड़ता है।"
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