"वफादार नेवला - क्या सावित्री ने सही किया? जानिए कैसे एक गलतफहमी ने एक बेगुनाह और वफादार जीव की जान ले ली। एक ऐसी कहानी जो हमें सोचने पर मजबूर कर देगी।"
वफादार नेवला: जल्दबाजी का घातक परिणाम
क्या आपने कभी गुस्से में कोई ऐसा काम किया है जिसका पछतावा आपको उम्र भर रहा हो? यह कहानी एक ऐसे वफादार जीव की है जिसने अपनी जान पर खेलकर उपकार किया, लेकिन बदले में उसे असमय मृत्यु मिली।
एक अनोखी दोस्ती
रामदास और सावित्री का एक छोटा सा सुखी संसार था। उनके घर में उनके छोटे बेटे महेश के साथ एक पालतू नेवला भी रहता था। महेश और नेवला साथ-साथ खेलते थे और दोनों के बीच एक अनूठा प्रेम था। नेवला केवल एक जानवर नहीं, बल्कि घर के सदस्य जैसा था।
साँप का हमला और नेवले की वीरता
एक दोपहर, जब महेश पालने में सो रहा था और घर के बड़े सदस्य अपने कामों से बाहर थे, तभी एक जहरीला साँप कमरे में घुस आया। साँप सीधे महेश के पालने की ओर बढ़ रहा था। नेवले ने जैसे ही खतरे को भाँपा, वह अपनी जान की परवाह किए बिना साँप पर टूट पड़ा। भीषण लड़ाई के बाद नेवले ने साँप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और नन्हे महेश की जान बचा ली।
गलतफहमी और खौफनाक अंत
सावित्री जब घर लौटी, तो नेवला खून से सने मुँह के साथ दरवाज़े पर उसका स्वागत करने पहुँचा। नेवले के मुँह पर खून देखकर सावित्री का दिमाग सुन्न हो गया। उसने सोचा— "इस जानवर ने मेरे बेटे को मार डाला!"
क्रोध और शोक में अंधी होकर उसने बिना कुछ सोचे पास पड़ा भारी डंडा उठाया और पूरी ताकत से नेवले पर वार कर दिया। बेगुनाह और वफादार नेवला वहीं तड़पकर मर गया।
देर से मिला सच
जब सावित्री अंदर कमरे में भागी, तो उसने देखा कि महेश चैन से सो रहा था और पास ही एक विशाल साँप मरा पड़ा था। सावित्री को अपनी भयानक भूल का अहसास हुआ। जिस वफादार मित्र ने उसके कुल के दीपक की रक्षा की थी, उसे उसने अपनी जल्दबाजी में मार डाला था। अब उसके पास रोने और पछताने के अलावा कुछ शेष नहीं था।
कहानी की सीख (The Moral)
"बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।"
भावार्थ: किसी भी कार्य को करने से पहले उसके सभी पहलुओं की जाँच कर लेनी चाहिए। आवेश में आकर किया गया कार्य केवल पछतावा और दुख ही लेकर आता है।
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