"डरपोक घोड़ा - क्या सुरक्षा के लिए गुलामी स्वीकार करना सही है? जानिए कैसे एक घोड़े ने बाघ के डर से अपनी आज़ादी मनुष्य के हाथों बेच दी।"
डरपोक घोड़ा: सुरक्षा की भारी कीमत
क्या सुरक्षित रहने के लिए अपनी स्वतंत्रता को दांव पर लगाना सही है? यह कहानी एक ऐसे घोड़े की है जिसने एक कल्पित डर से बचने के लिए खुद को हमेशा के लिए जंजीरों में जकड़ लिया।
बाघ का डर और मदद की पुकार
जंगल में रहने वाले एक घोड़े के मन में अचानक बाघ का डर बैठ गया। उसे लगा कि वह अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता। वह भागता हुआ एक मनुष्य के पास पहुँचा और गिड़गिड़ाते हुए बोला— "भाई, मेरी मदद करो! जंगल का बाघ मुझे खा जाएगा। मुझे कोई ऐसा सुरक्षित स्थान दो जहाँ वह पहुँच न सके।"
चालाक मनुष्य और घोड़े का समझौता
मनुष्य ने घोड़े की घबराहट का फायदा उठाया। उसने कहा— "मैं तुम्हारी रक्षा ज़रूर करूँगा, लेकिन तुम्हें मेरी एक शर्त माननी होगी। सुरक्षा के बदले तुम्हें पूरी तरह मेरे नियंत्रण में रहना होगा।"
मौत के डर से कांप रहे घोड़े ने बिना सोचे-समझे कह दिया— "तुम जो चाहो करो, बस मेरी जान बचा लो!"
आज़ादी का अंत और अस्तबल की कैद
मनुष्य ने तुरंत घोड़े की पीठ पर भारी काठी कसी और उसके मुँह में लोहे की लगाम डाल दी। उसने घोड़े पर सवारी की और उसे ले जाकर एक अंधेरे अस्तबल में बांध दिया।
मनुष्य ने मुस्कुराकर कहा— "अब तुम यहाँ पूरी तरह सुरक्षित हो। अब से तुम केवल मेरी मर्जी से बाहर निकलोगे और मेरी सवारी बनोगे।" जब दरवाजा बंद हुआ, तब घोड़े को अहसास हुआ कि उसने बाघ के डर से बचने के चक्कर में अपनी स्वच्छंद उड़ान और आज़ादी हमेशा के लिए खो दी है।
कहानी की सीख (The Moral)
"स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा किसी काम की नहीं।"
भावार्थ: डर हमें कमज़ोर बनाता है और कमज़ोर व्यक्ति आसानी से दूसरों का गुलाम बन जाता है। जीवन में चुनौतियों का सामना स्वयं करना चाहिए, क्योंकि दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता हमारी आज़ादी छीन लेती है।
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