"नमक का व्यापारी और गधा - क्या गधे की चालाकी काम आई? जानिए कैसे एक व्यापारी ने रूई के बोरों से अपने कामचोर गधे को जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाया।"
नमक का व्यापारी और गधा: आलस्य का भारी परिणाम
क्या आप जानते हैं कि अपनी चतुराई का गलत इस्तेमाल करना कभी-कभी खुद पर ही भारी पड़ जाता है? यह कहानी एक ऐसे गधे की है जिसने काम से बचने के लिए एक योजना बनाई, लेकिन उसकी वही योजना उसके लिए जी का जंजाल बन गई।
अचानक मिली राहत
एक नमक का व्यापारी रोज़ अपने गधे पर नमक की बोरियाँ लादकर बाज़ार जाता था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। एक दिन नदी पार करते समय गधा गलती से फिसलकर पानी में गिर गया। जब वह उठा, तो उसने महसूस किया कि उसकी पीठ का बोझ बहुत कम हो गया है, क्योंकि नमक पानी में घुल गया था। गधे को यह "नुस्खा" बहुत पसंद आया।
गधे की जानबूझकर की गई चालाकी
अगले दिन, गधे ने सोचा— "क्यों न मैं फिर से वही करूँ?" जैसे ही वे नदी के बीच पहुँचे, गधा जानबूझकर पानी में बैठ गया। फिर से नमक घुल गया और गधा हल्के बोझ के साथ मज़े से आगे बढ़ा। व्यापारी चालाक था, वह समझ गया कि गधा उसे धोखा दे रहा है और जानबूझकर नुकसान कर रहा है।
व्यापारी का "रूई वाला" सबक
व्यापारी ने गधे को सबक सिखाने का निश्चय किया। अगले दिन उसने नमक की जगह गधे की पीठ पर रूई (Cotton) की बोरियाँ लाद दीं। गधे ने सोचा कि आज भी वही तरकीब काम आएगी। वह फिर से नदी के बीच जाकर बैठ गया।
लेकिन इस बार पासा पलट गया! रूई ने पानी सोख लिया और वह पहले से कहीं ज़्यादा भारी हो गई। जब गधा खड़ा हुआ, तो बोझ इतना बढ़ चुका था कि उसे चलना भी मुश्किल हो गया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उस दिन के बाद उसने कभी कामचोरी नहीं की।
कहानी की सीख (The Moral)
"चालाकी हमेशा काम नहीं आती और आलस्य का फल अक्सर भारी होता है।"
भावार्थ: ईमानदारी से किया गया काम ही सुख देता है। यदि हम छल-कपट से अपना काम हल्का करना चाहेंगे, तो भाग्य हमें और भी कठिन परिस्थिति में डाल सकता है।
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