स्वार्थी चमगादड़: दो नावों की सवारी का अंजाम
क्या आपने कभी सोचा है कि चमगादड़ केवल अंधेरे में ही क्यों निकलते हैं? लोककथाओं के अनुसार, इसके पीछे उनके स्वार्थ और अवसरवाद की एक प्राचीन कहानी छिपी है।
पशु-पक्षियों का युद्ध और चमगादड़ों की चाल
बहुत समय पहले, जंगल के पशुओं और पक्षियों के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ गया। सभी अपनी-अपनी सेनाएँ तैयार कर रहे थे, लेकिन चमगादड़ बड़े असमंजस में थे। उन्होंने सोचा— "हम पक्षियों की तरह उड़ते तो हैं, पर हमारे पंख नहीं हैं और न ही हम अंडे देते हैं। हम पशुओं की तरह दिखते हैं, पर ज़मीन पर चल नहीं सकते।"
अपनी चतुराई दिखाते हुए उन्होंने तय किया कि वे युद्ध में किसी का पक्ष नहीं लेंगे। वे बस दूर से तमाशा देखते रहे ताकि जो पक्ष जीतने लगे, वे उसी की टीम में शामिल होकर मजे ले सकें।
बार-बार पाला बदलना
जब युद्ध शुरू हुआ और पशुओं का पलड़ा भारी दिखने लगा, तो चमगादड़ तुरंत पशु-दल के पास पहुँचे और बोले, "देखो, हमारा चेहरा पशुओं जैसा है, हम तुम्हारे साथी हैं।"
लेकिन कुछ समय बाद पक्षियों ने अपनी ताकत दिखाई और वे जीतने लगे। चमगादड़ों ने फौरन पाला बदला और पक्षी-दल के पास जाकर बोले, "हम तो हवा में उड़ते हैं, इसलिए हम तो पक्षी ही हुए। हमें अपनी टीम में शामिल कर लो।"
संधि और बहिष्कार
अंततः युद्ध थमा और दोनों पक्षों को समझ आया कि लड़ने में कोई फायदा नहीं है। पशुओं और पक्षियों ने आपस में दोस्ती (संधि) कर ली। जब शांति हुई, तब चमगादड़ों की पोल खुल गई। दोनों दलों ने देखा कि इन चमगादड़ों ने केवल अपने फायदे के लिए बार-बार वफादारी बदली है।
पशुओं और पक्षियों ने मिलकर चमगादड़ों का बहिष्कार कर दिया और उन्हें समाज से बाहर निकाल दिया। अपमानित और अकेले होकर चमगादड़ दूर चले गए और अंधेरे कोटरों में छिप गए।
कहानी की सीख (The Moral)
"स्वार्थी मित्र किसी को अच्छे नहीं लगते। जो व्यक्ति संकट के समय साथ देने के बजाय केवल अपना लाभ देखता है, वह अंत में सबका विश्वास खो देता है और अकेला रह जाता है।"

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