"दो मेंढक - जब दोनों दूध के मटके में गिरे, तो एक ने हार मान ली और दूसरे ने इतिहास रच दिया। पढ़िए संघर्ष की यह अद्भुत कहानी।"
दो मेंढक: संघर्ष और सफलता की कहानी
क्या आप मुश्किल समय में हार मान लेते हैं या आखिरी सांस तक लड़ते हैं? यह कहानी दो ऐसे मेंढकों की है जिनके सामने एक जैसी मुसीबत थी, लेकिन उनके नजरिए ने उनकी किस्मत बदल दी।
दूध का मटका और जीवन का संकट
एक बार दो मेंढक गलती से दूध से भरे एक गहरे मटके में गिर गए। मटका काफी बड़ा था और दूध की वजह से उसकी दीवारें चिकनी थीं। दोनों ने बाहर निकलने के लिए हाथ-पैर मारना शुरू किया, लेकिन नीचे कोई ठोस ज़मीन न होने के कारण वे छलांग नहीं लगा पा रहे थे।
वे काफी देर तक दूध में गोल-गोल तैरते रहे। दूध में तैरना पानी के मुकाबले बहुत ज्यादा थका देने वाला था।
निराशा बनाम उम्मीद
काफी समय बीत जाने के बाद, पहले मेंढक ने हिम्मत हार दी। उसने हांफते हुए दूसरे मेंढक से कहा— "भाई, अब मुझमें और ताकत नहीं बची। हम यहाँ से कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे। तैरने का अब कोई फायदा नहीं है।"
उसने प्रयास करना छोड़ दिया और देखते ही देखते वह दूध में डूब गया और उसकी जान चली गई।
लेकिन दूसरा मेंढक अलग मिट्टी का बना था। उसने खुद से कहा— "चाहे जो हो जाए, मैं अपनी आखिरी सांस तक कोशिश करूँगा। तैरते रहने में ही जीवन है, रुक जाने में तो निश्चित मौत है।" वह लगातार अपने पैर चलाता रहा, थकावट के बावजूद उसने हार नहीं मानी।
चमत्कार: मेहनत का फल
उसकी लगातार मेहनत का एक अनोखा परिणाम निकला। मेंढक के पैरों द्वारा दूध को बार-बार मथने के कारण दूध में हलचल हुई और धीरे-धीरे उसके ऊपर मक्खन का एक बड़ा गोला जमा हो गया।
अब मेंढक को वह 'ठोस आधार' मिल गया था जिसकी उसे तलाश थी। वह फुर्ती से मक्खन के उस गोले पर चढ़ा और वहां से एक ज़ोरदार छलांग लगाई। वह सीधा मटके के बाहर जा गिरा और उसकी जान बच गई।
कहानी की सीख (The Moral)
"ईश्वर उसी की मदद करता है जो स्वयं अपनी मदद करता है। कठिन परिस्थितियों में जो धैर्य नहीं खोते और निरंतर प्रयास करते रहते हैं, सफलता उन्हीं के कदम चूमती है।"
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