"दो बकरे - क्या हठ करना हमेशा सही होता है? पढ़िए यह प्रसिद्ध कहानी कि कैसे दो बकरों ने अहंकार में जान गँवाई और दो बकरियों ने अपनी बुद्धि से रास्ता निकाला।"
दो बकरे और दो बकरियाँ: अहंकार और समझदारी का अंतर
क्या अपनी बात पर अड़े रहना हमेशा सही होता है? यह कहानी एक ही पुल पर घटी दो अलग-अलग घटनाओं के माध्यम से हमें जीवन का सबसे बड़ा पाठ सिखाती है।
पहली घटना: अहंकार का अंत
एक पहाड़ी झरने पर लकड़ी का एक बहुत ही सँकरा पुल बना था। पुल इतना छोटा था कि एक समय में केवल एक ही जीव उसे पार कर सकता था।
संयोग से, एक काला बकरा एक तरफ से और एक भूरा बकरा दूसरी तरफ से पुल पर आ गए। बीचो-बीच दोनों का आमना-सामना हुआ।
काला बकरा गुर्राया: "पीछे हट जा! पहले मैं निकलूँगा।"
भूरा बकरा चिल्लाया: "तू पीछे हट! वरना मैं तुझे नीचे झरने में फेंक दूँगा।"
दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं था। गुस्से में दोनों ने अपने सिर टकराए और आपस में भिड़ गए। जैसे ही उन्होंने एक-दूसरे को धक्का दिया, उनका संतुलन बिगड़ गया। दोनों बकरे सीधे झरने के तेज बहाव में जा गिरे और डूबकर अपनी जान गँवा बैठे।
दूसरी घटना: समझदारी की जीत
कुछ समय बाद, उसी संकरे पुल पर फिर से वही स्थिति पैदा हुई। इस बार दो बकरियाँ आमने-सामने थीं। लेकिन वे दोनों स्वभाव से शांत और बुद्धिमान थीं।
उन्हें पता था कि अगर वे भी लड़ने लगीं, तो उनका अंत भी उन बकरों जैसा ही होगा। उनमें से एक बकरी ने सूझबूझ दिखाई और वहीं पुल पर शांति से बैठ गई। उसने दूसरी बकरी को अपने ऊपर से धीरे से गुजर जाने का रास्ता दे दिया।
जब दूसरी बकरी सुरक्षित निकल गई, तो पहली बकरी भी उठ खड़ी हुई और आराम से पुल पार कर लिया। दोनों ने अपनी समझदारी से न केवल समय बचाया, बल्कि अपनी जान भी बचाई।
कहानी की सीख (The Moral)
"क्रोध और अहंकार दुख का कारण हैं, जबकि धैर्य और समझौता सुख का आधार। समझदारी से लिया गया एक छोटा सा फैसला बड़ी मुसीबतों को टाल सकता है।"
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