अहंकार बनाम श्रद्धा: बुढ़िया और सेठानी की कथा
एक बार कैलाश पर बैठे भगवान शिव का मन पृथ्वी भ्रमण का हुआ। जब वे चलने लगे, तो माता पार्वती ने साथ चलने का हठ किया। महादेव ने मुस्कराकर कहा, "देवी, वहां का जीवन कठिन है।" पर पार्वती जी नहीं मानीं और दोनों ने साधारण मनुष्यों का रूप धरकर धरती पर कदम रखा।
घूमते-घूमते पार्वती जी को थकान और भूख महसूस हुई। उन्होंने इच्छा जताई, "स्वामी, मुझे आज खीर-खांड का भोजन करना है।" महादेव उन्हें लेकर एक भव्य महल के द्वार पर पहुँचे। वहां एक धनी सेठानी खड़ी थी। शिवजी ने द्वार खटखटाया और भोजन मांगा। सेठानी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और झिड़कते हुए बोली, "खीर खानी है तो अपने घर जाकर खाओ! क्या यहाँ मैंने कोई भंडारा खोल रखा है?" और उसने मुँह पर दरवाजा बंद कर लिया।
आगे बढ़ने पर उन्हें एक टूटी-फूटी झोपड़ी मिली, जहाँ एक गरीब बुढ़िया रहती थी। उसने बड़े प्रेम से दोनों का स्वागत किया। जब शिवजी ने भोजन की इच्छा जताई, तो वह सहर्ष तैयार हो गई, लेकिन उसकी रसोई में अन्न का एक दाना भी नहीं था। वह बाहर जाने लगी, तो शिवजी ने पूछा, "माई, कहाँ जा रही हो?" उसने कहा, "महाराज, घर में कुछ नहीं है, पड़ोस से दूध-चावल माँगने जा रही हूँ।" शिवजी बोले, "कहीं मत जाओ, एक बार फिर अपनी रसोई देखो।"
बुढ़िया ने अंदर जाकर देखा तो चकित रह गई! बर्तन दूध और चावल से भरे थे। उसने झटपट खीर बनाई और बड़े लाड़ से दोनों को खिलाई। जब वे चलने लगे, तो बुढ़िया बोली, "महाराज, मेरे घर में तो कोई और है नहीं, इस बची हुई खीर का मैं क्या करूँगी?" शिवजी ने मुस्कराकर कहा, "माई, आँखें बंद करो।" जब उसने आँखें खोलीं, तो घर बेटा-बहू और पोते-पोतियों की किलकारियों से गूँज रहा था। वह खुश तो हुई, पर बोली, "प्रभु, इतनी बड़ी गृहस्थी इस छोटी झोपड़ी में कैसे रहेगी?" शिवजी ने जाते-जाते झोपड़ी को एक ठोकर मारी और वह विशाल स्वर्ण महल में बदल गई।
जब शिव-पार्वती अपने असली रूप में प्रकट हुए, तो बुढ़िया उनके चरणों में गिर पड़ी। बाद में जब वह सेठानी के पास प्रसाद देने पहुँची, तो सेठानी का महल झोपड़ी बन चुका था। सेठानी रोती हुई महादेव के पास पहुँची और अपना धन वापस मांगा। तब महादेव ने एक मर्मस्पर्शी बात कही: "उस बुढ़िया ने 'हाँ' की थी तो उसकी 'हाँ' हो गई, तुमने 'ना' की तो तुम्हारी 'ना' हो गई।" सेठानी को अपनी भूल का अहसास हुआ, पर उसे अब परिश्रम का जीवन ही जीना था।

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