भक्ति और धैर्य की अग्निपरीक्षा: मोहन और गोमती की गाथा
उत्तर भारत के एक शांत और सुंदर गाँव में मोहन नाम का एक निर्धन किसान रहता था। मोहन के पास धन-दौलत तो नहीं थी, पर उसके पास 'संतोष' और 'शिव-भक्ति' का ऐसा अनमोल खजाना था, जिसे कोई चोर नहीं चुरा सकता था। उसकी पत्नी गोमती भी उतनी ही सरल और धर्मपरायण थी। उनके घर की सुबह सूरज की किरणों से नहीं, बल्कि 'ॐ नमः शिवाय' के जाप से होती थी।
मोहन के जीवन का सबसे बड़ा सहारा उसके दो बैल थे—शंभू और नंदी। मोहन उन्हें पशु नहीं, अपने बच्चों की तरह प्यार करता था।
भाग्य का क्रूर प्रहार
एक तपती दुपहरी के बाद जब मोहन गहरी नींद में सो रहा था, तभी कुछ दुष्ट चोरों ने अँधेरे का फायदा उठाकर शंभू और नंदी को चुरा लिया। सुबह जब मोहन की आँख खुली और उसने गोशाला को खाली देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह पागलों की तरह यहाँ-वहाँ दौड़ा, चिल्लाया, पर उसके बैल कहीं नहीं मिले।
मोहन अपनी छोटी सी शिव-मूर्ति के सामने फूट-फूटकर रोने लगा— "हे महादेव! यह कैसी परीक्षा है? क्या मेरी भक्ति में कोई कमी थी जो आपने मेरा एकमात्र सहारा छीन लिया? अब मेरा खेत कौन जोतेगा? मेरे बच्चे क्या खाएंगे?"
विश्वास की शक्ति
गाँव के कुछ लोगों ने उसे ढांढस बंधाया, तो कुछ ने ताना मारा— "देख लिया तुम्हारी भक्ति का फल? दिन-रात शिव-शिव करते थे, आज दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो।"
लेकिन गोमती, जिसका विश्वास हिमालय की तरह अटल था, उसने मोहन का हाथ थामकर कहा— "स्वामी, घबराइए मत। महादेव अगर एक द्वार बंद करते हैं, तो सौ रास्ते खोलते भी हैं। संकट के समय ही तो हमारे धैर्य की परीक्षा होती है। उन पर भरोसा रखिए।"
दिन बीतते गए, मोहन ने हर जगह खाक छानी, जंगल-जंगल भटका, लेकिन बैलों का कहीं पता नहीं चला। बुवाई का समय निकला जा रहा था। बिना बैलों के खेत जोतना नामुमकिन था।
महादेव की अलौकिक लीला
एक दोपहर, जब मोहन हताश होकर अपनी कुटिया के बाहर बैठा था, तभी एक वृद्ध संन्यासी वहाँ से गुजरे। उनके चेहरे पर एक दिव्य तेज था। उन्होंने मोहन के कंधे पर हाथ रखा और कहा— "बेटा, दुखी क्यों होते हो? महादेव कभी अपने भक्त का हाथ नहीं छोड़ते। यदि तुम्हारे पास बैल नहीं हैं, तो क्या हुआ? क्या तुम्हें उस 'नंदीश्वर' पर भरोसा नहीं है जो पूरी सृष्टि का भार उठाते हैं?"
संन्यासी ने उसे एक विचित्र सलाह दी— "कल सुबह ब्रह्म मुहूर्त में अपना हल लेकर खेत पर जाना। महादेव का नाम लेना और हल चलाना शुरू कर देना। पीछे मुड़कर मत देखना, बस आगे बढ़ते जाना।"
मोहन को पहले तो यह पागलपन लगा, पर गोमती के कहने पर उसने ऐसा ही करने का निश्चय किया। अगले दिन सुबह-सुबह जब गाँव सो रहा था, मोहन अपने कंधे पर हल रखकर खेत पहुँचा। गाँव के कुछ लोग यह 'तमाशा' देखने के लिए वहाँ जुट गए कि बिना बैल के मोहन खेत कैसे जोतेगा।
मोहन ने हल की मूठ पकड़ी, अपनी आँखें बंद कीं और पूरी शक्ति से गर्जना की— "हर-हर महादेव!"
जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, उसे महसूस हुआ कि हल अपने आप मिट्टी चीरते हुए आगे बढ़ रहा है। उसे ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य, विशाल शक्ति उसके हल को खींच रही है। खेत की मिट्टी ऐसे पलट रही थी जैसे कोई बहुत ही शक्तिशाली जोड़ी बैल वहाँ काम कर रही हो।
देखते ही देखते, पूरा खेत जोत दिया गया। गाँव वाले दंग रह गए! किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, पर मोहन की आँखों से बहते आँसू बता रहे थे कि उसे अपने 'शंभू' और 'नंदी' की उपस्थिति का अहसास हो गया था।
शाम को जब मोहन घर लौटा, तो उसने देखा कि उसके गोशाला में शंभू और नंदी बँधे हुए थे! वे चोर, जो उन्हें ले गए थे, खुद उन्हें वापस छोड़ गए क्योंकि रात भर उन्हें डरावने सपने आए और उन्हें ऐसा लगा कि कोई विशाल बैल उनका पीछा कर रहा है।
सीख: यह कहानी हमें सिखाती है कि जब हम अपना सब कुछ ईश्वर को सौंप देते हैं, तो वह स्वयं हमारे कार्यों का भार उठा लेते हैं।

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