जूता बनाने वाला और नन्हे फरिश्ते
बहुत पुरानी बात है, एक गाँव में केशव नाम का एक जूता बनाने वाला अपनी पत्नी उमा के साथ रहता था। केशव एक बहुत ही ईमानदार और मेहनती इंसान था, लेकिन वक्त की मार ऐसी पड़ी कि उसकी आमदनी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। एक शाम ऐसी आई जब उसके पास केवल एक जोड़ी जूते बनाने लायक चमड़ा बचा था।
केशव ने भारी मन से चमड़े को काटा और सोचा कि सुबह उठकर इसे सिल देगा। उसने उमा से कहा, "शायद यह मेरा आखिरी काम है, उमा। इसके बाद हमारे पास न पैसा बचेगा, न काम।" उमा ने उसका हाथ थामकर कहा, "ईश्वर पर भरोसा रखिए, सब ठीक होगा।"
आधी रात का चमत्कार
अगली सुबह जब केशव अपनी कार्यशाला (वर्कशॉप) पहुँचा, तो उसकी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। मेज पर चमड़े के टुकड़ों की जगह एक बहुत ही सुंदर और शानदार जूते की जोड़ी तैयार रखी थी। उसकी सिलाई इतनी बारीक थी कि केशव खुद भी वैसी नहीं कर सकता था।
वह जूता बाजार में बहुत ऊँचे दाम पर बिका। उन पैसों से केशव ने दो और जूतों के लिए चमड़ा खरीदा। रात को उसने फिर कटिंग की और सो गया। सुबह फिर वही चमत्कार! मेज पर दो जोड़ी चमचमाते जूते रखे थे। धीरे-धीरे केशव की किस्मत बदल गई। उसके बनाए जूतों की चर्चा पूरे शहर में होने लगी और वह एक अमीर और सम्मानित कारीगर बन गया।
वह गुप्त राज
एक रात उमा ने कहा, "केशव, हमें पता लगाना चाहिए कि हमारी मदद कौन कर रहा है। कल क्रिसमस है, चलिए आज रात छुपकर देखते हैं।"
दोनों कार्यशाला के कोने में छुप गए। जैसे ही आधी रात की घड़ी बजी, खिड़की से दो नन्हे बौने गाते और झूमते हुए अंदर आए। उनके कपड़े फटे-पुराने थे, पर उनके हाथों में जादू था। वे बहुत तेजी से काम करने लगे और देखते ही देखते कई जूते तैयार कर दिए। भोर होने से पहले वे वापस गायब हो गए।
कृतज्ञता का उपहार
केशव और उमा भावुक हो गए। उमा ने कहा, "उन नन्हे फरिश्तों के पास पहनने को अच्छे कपड़े तक नहीं हैं। क्यों न हम उनके लिए कुछ करें?"
क्रिसमस की पूर्व संध्या पर, केशव ने उन नन्हे पैरों के लिए सबसे मुलायम चमड़े के सुंदर जूते बनाए और उमा ने छोटे-छोटे जैकेट, कमीज और टोपी सिली। रात को उन्होंने जूतों के चमड़े की जगह ये सुंदर उपहार मेज पर रख दिए।
जब बौने आए और उन्होंने अपने लिए नए कपड़े और जूते देखे, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने वे कपड़े पहने और खुशी से नाचते हुए खिड़की से बाहर निकल गए।
एक नई शुरुआत
उस रात के बाद बौने फिर कभी वापस नहीं आए। केशव थोड़ा उदास हुआ, पर उमा ने उसे समझाया, "वे हमारी मदद करने तब आए थे जब हम लाचार थे। अब उन्होंने हमें खुद के पैरों पर खड़ा कर दिया है।"
केशव ने बौनों से सिलाई की जो बारीकियां सीखी थीं, उनका इस्तेमाल करके वह खुद ही बेहतरीन जूते बनाने लगा। उसने और उमा ने अपना पूरा जीवन मेहनत और ईमानदारी से बिताया और वे हमेशा उन नन्हे फरिश्तों की दयालुता को याद करते रहे।

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