अटूट दोस्ती और महादेव की कृपा
चंदनपुर के शांत वातावरण में दो जिगरी यार रहते थे— आर्यन और कबीर। उनकी दोस्ती बचपन की मिट्टी में पली-बढ़ी थी। गाँव वाले उन्हें केवल उनकी गहरी दोस्ती के लिए ही नहीं, बल्कि उनके अटूट 'शिव प्रेम' के लिए भी जानते थे।
एक संकल्प और घर की किच-किच
एक शाम मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर आर्यन ने कबीर के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "भाई, इस बार भी महाशिवरात्रि पर हम दोनों साथ व्रत रखेंगे और पारण भी साथ ही करेंगे। याद है न? 12 साल की उम्र से यह सिलसिला चलता आ रहा है।"
कबीर मुस्कुराया, "बिल्कुल याद है भाई! पर ये बता, कल जब मैं तेरे घर आया तो भाभी इतनी उखड़ी-उखड़ी क्यों थीं?"
आर्यन ने एक लंबी सांस ली, "अरे छोड़ यार, रीता का तो रोज का है। छोटी-छोटी बातों पर क्लेश करना उसकी आदत बन गई है।"
कबीर ने सहानुभूति जताते हुए कहा, "हाल तो मेरा भी वही है भाई। सीमा भी दिन भर किच-किच करती रहती है। कभी-कभी तो मन करता है कि सब छोड़-छाड़ कर कहीं दूर चला जाऊं।"
"पागल है क्या?" आर्यन ने उसे टोका, "तू एक दिन के लिए भी कहीं ओझल होता है तो मेरा मन नहीं लगता।"
गरीबी की मार और उम्मीद की किरण
कबीर की आंखों में नमी आ गई, "आर्यन, माँ की तबीयत बहुत खराब है और हाथ तंग है। समझ नहीं आता क्या करूं।"
आर्यन ने उत्साह से कहा, "पैसों की फिक्र मत कर! जमींदार जी मेरी पुश्तैनी जमीन वापस कर रहे हैं। अब मैं उसमें सब्जियां उगाऊंगा। तुझे अब कभी पैसों के लिए सोचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
कबीर ने स्वाभिमान से कहा, "मैं दोस्ती में पैसा नहीं लाना चाहता भाई, पर तेरी तरक्की सुनकर दिल खुश हो गया।"
समय बीतता गया। कबीर दिन-भर मजदूरी करता, पर सारा पैसा माँ की दवाइयों में उड़ जाता। दूसरी तरफ, आर्यन की मेहनत रंग लाई और उसकी खेती से अच्छी कमाई होने लगी।
कड़वाहट और दूरियां
एक दिन कबीर की पत्नी सीमा ने बीमार सास को देखकर झिड़कते हुए कहा, "मुझसे अब इनकी सेवा नहीं होती। क्यों नहीं इन्हें किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आते?"
कबीर दहाड़ उठा, "मेरी माँ के लिए दोबारा ऐसे शब्द मत निकालना!"
सीमा ने ताना मारा, "बड़ा आया माँ का लाडला! और वो तेरा अमीर दोस्त? जब से उसे जमीन मिली है, उसके और उसकी पत्नी रीता के तो पैर जमीन पर नहीं पड़ते। तेरे बुरे वक्त में उसने एक धेला भी दिया?"
कबीर ने बचाव किया, "उसने कई बार पूछा, पर मैं खुद नहीं चाहता कि पैसे हमारी दोस्ती खराब करें।"
उधर आर्यन के घर में भी यही हाल था। जब कबीर उससे मिलने आया, तो आर्यन की पत्नी रीता ने उसका अपमान किया, "लो! कृष्ण के घर सुदामा पधारे हैं। अजी सुनते हो, देखो तुम्हारा भिखारी दोस्त आया है, जरूर कुछ मांगने आया होगा।"
पत्नियों के तानों और घर के कलह ने धीरे-धीरे दोनों दोस्तों के बीच एक खामोश दीवार खड़ी कर दी। दोनों ने बात करना बंद कर दिया।
शिवरात्रि का चमत्कार
महाशिवरात्रि का दिन आया। कबीर कर्ज में डूबा था और आर्यन अपनी सफलता के शिखर पर था। आर्यन ने मंदिर में गरीबों को दान देने की मन्नत मांगी थी।
जब कबीर और उसकी पत्नी दान की लाइन में लगे, तो सामने दान बांटने वाला कोई और नहीं, बल्कि आर्यन था।
दोनों की नजरें मिलीं। आर्यन की आंखों में आंसू आ गए। उसने कबीर को गले लगा लिया और कहा, "क्या देख रहा है भाई? मैं भी तेरी तरह ही साधारण इंसान हूँ, कोई अमीरजादा नहीं। मैं तुझे कभी नहीं भूल पाया।"
दोनों की पत्नियों ने फिर से जहर उगलना शुरू किया और उन्हें अलग करने की कोशिश की, पर इस बार दोनों दोस्त अडिग थे।
आर्यन ने गरज कर कहा, "बस बहुत हुआ! अब कोई ताकत मुझे मेरे जिगरी यार से अलग नहीं कर सकती।"
कबीर ने भी साथ दिया, "हाँ रीता, तूने और सीमा ने बहुत कोशिश की, पर आज खुद महादेव ने हमें मिलाया है। हमारी दोस्ती अब और मजबूत होगी।"
सूरज और लालची साहूकार (एक नया अध्याय)
गाँव का एक और युवक था, सूरज। उसने साहूकार दमन सिंह से ₹5000 कर्ज लिया था। सूरज हर महीने ईमानदारी से सूद देता, फिर भी दमन सिंह ने हिसाब में हेरफेर कर उसकी पुश्तैनी जमीन हड़पने की साजिश रची।
सूरज टूट चुका था। तभी उसे एक सन्यासी मिले जिन्होंने उसे उत्तर दिशा में स्थित शिव मंदिर जाकर रात भर प्रार्थना करने की सलाह दी।
सूरज ने मंदिर में कड़ी तपस्या की। भोलेनाथ ने उसकी परीक्षा ली:
पहले उसे खीर-पूरी का लालच दिया गया, पर सूरज ने अपने लक्ष्य (गाँव की भलाई) को याद रखा।
फिर उसे सोने की मोहरें दी गईं, पर सूरज ने कहा कि सिर्फ मेरा भला होने से क्या होगा, पूरे काशीपुर को मुक्ति चाहिए।
सूरज की निस्वार्थ भावना देखकर महादेव प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद दिया।
सत्य की जीत
सूरज दिव्य तेज के साथ साहूकार के पास पहुँचा और पूरे गाँव का हिसाब माँगा। महादेव के चमत्कार से दमन सिंह के सारे बही-खाते गायब हो गए। पकड़े जाने के डर से दमन सिंह गाँव छोड़कर भाग गया।
पूरा गाँव दमन सिंह के आतंक से मुक्त हो गया। सूरज और सभी गाँव वालों ने मिलकर भोलेनाथ के मंदिर में मत्था टेका और उनकी महिमा के गुणगान किए।

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