अभिमानी 'गुल' और रेगिस्तान के रक्षक
एक तपते हुए रेगिस्तान में, जहाँ दूर-दूर तक जीवन का नामोनिशान न था, वहाँ कुदरत का एक करिश्मा हुआ। रेत के बीचों-बीच एक नन्हा सा पौधा पनपा और देखते ही देखते वह एक जादुई गुलाब में बदल गया। उसका नाम रखा गया— गुल।
गुल की सुंदरता ऐसी थी कि जो उसे देखता, बस देखता ही रह जाता। उसकी मखमली लाल पंखुड़ियां और उसकी महक रेगिस्तान की सूखी हवा में भी जादू घोल देती थी।
दो अनूठे दोस्त: शेरू और लंबे खां
गुल के बिल्कुल पास ही दो कैक्टस के पौधे उगे थे। एक का नाम था शेरू (जो छोटा और गोल था) और दूसरे का नाम था लंबे खां (जो काफी लंबा और कद्दावर था)। ये दोनों कैक्टस अपनी अजीब शक्ल के बावजूद बहुत खुशमिजाज थे। उन्हें गर्व था कि उनके बीच 'गुल' जैसा खूबसूरत फूल खिला है।
बचपन में गुल बहुत चुलबुली थी। वह अक्सर लंबे खां को चुटकी काटती और सारा इल्जाम बेचारे नन्हे शेरू पर लगा देती। शेरू और लंबे खां आपस में बहस करते रहते, पर कभी उस मासूम गुलाब पर शक नहीं करते थे।
त्याग और निस्वार्थ प्रेम
रेगिस्तान में पानी की एक-एक बूंद कीमती होती है। शेरू और लंबे खां कैक्टस होने के नाते अपने अंदर पानी जमा करके रखते थे। वे दोनों अपना पानी गुल को पिलाते ताकि वह मुरझाए नहीं। उन्होंने कभी गुल को यह नहीं बताया कि अगर वे अपना हिस्सा उसे न दें, तो वह इस गर्मी में एक दिन भी जीवित नहीं रह पाएगी।
महीनों बाद, गुल दुनिया का सबसे खूबसूरत फूल बन गई। उसकी जड़ें मजबूत हो गईं, लेकिन उसे पानी पीने के लिए थोड़ा झुकना पड़ता था, जिससे उसके तने पर हल्का सा निशान पड़ गया था।
सैलानी का आना और घमंड का जन्म
एक दिन रेगिस्तान में ऊंट पर सवार एक सैलानी आया। वह इस अद्भुत गुलाब को देखकर दंग रह गया। उसने अपने पानी के प्याले से गुल पर पानी छिड़का। जैसे ही गुल ने पानी के प्याले में अपना प्रतिबिंब (Refection) देखा, उसका मन अहंकार से भर गया।
वह सोचने लगी, "मैं कितनी शानदार हूँ! ये बदसूरत कैक्टस तो मेरे आगे कुछ भी नहीं। शायद ये मेरी वजह से ही अच्छे दिखते हैं।"
सैलानी ने लालच में आकर कहा, "इतना सुंदर फूल इस वीरान जगह क्या कर रहा है? इसे तो शहर के किसी आलीशान बाग में होना चाहिए। मैं इसे जड़ से उखाड़कर ले जाऊंगा।"
कैक्टस का साहस
शेरू और लंबे खां जानते थे कि शहर बहुत दूर है और जड़ से उखड़ने के बाद गुल रास्ते में ही दम तोड़ देगी। जैसे ही सैलानी उसे उखाड़ने बढ़ा, दोनों कैक्टस ने अपने कांटे बाहर निकाल लिए और सैलानी को घायल कर दिया। दर्द और गुस्से में सैलानी उन्हें कोसता हुआ वहाँ से भाग गया।
अहंकार और पश्चाताप
बजाय अपने दोस्तों का शुक्रिया अदा करने के, गुल उन पर चिल्लाने लगी— "तुम दोनों मुझसे जलते हो! तुमने मुझे शहर जाने से क्यों रोका? तुम बदसूरत हो और मैं सबसे सुंदर। मुझे तुम जैसे कांटों की जरूरत नहीं है।"
शेरू ने समझाने की कोशिश की, "गुल, वह तुम्हें सिर्फ अपने फायदे के लिए ले जा रहा था।"
पर गुल ने कसम खा ली कि वह अब कभी इन 'बदसूरत' कैक्टस से पानी नहीं मांगेगी। उसने अपनी गर्दन अकड़ा ली।
परिणाम:
एक हफ्ते बाद गुल की जड़ें सूखने लगीं।
उसकी पंखुड़ियां मुरझाने लगीं और उसे कमजोरी महसूस होने लगी।
घमंड के कारण वह झुकना नहीं चाहती थी, पर कुदरत के आगे उसकी एक न चली।
जब वह बेहोश होने वाली थी, तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह रोते हुए बोली, "मुझे माफ कर दो दोस्तों, मैंने तुम्हारे त्याग का अपमान किया।"
बिना एक पल गंवाए, शेरू और लंबे खां ने फिर से अपना जमा किया हुआ पानी गुल पर बरसा दिया। धीरे-धीरे गुल फिर से खिल उठी। उसने समझ लिया था कि खूबसूरती बाहरी होती है, पर सच्ची ताकत साथ मिलकर रहने और अपनों के त्याग को समझने में है।

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