गधे की परछाई: व्यर्थ के विवाद का बुरा अंत
क्या आपने कभी ऐसी चीज़ के लिए झगड़ा किया है जो वास्तव में किसी की नहीं होती? यह कहानी एक यात्री और एक गधे के मालिक की है, जिनकी मूर्खता ने उन्हें भीषण गर्मी में बेसहारा छोड़ दिया।
तपती धूप और गधे का सहारा
कड़ी गर्मी का मौसम था। एक यात्री को एक लंबे और निर्जन मैदान को पार करके दूसरे गाँव जाना था। गर्मी से बचने और सफर आसान करने के लिए उसने एक गधा किराए पर लिया। गधा काफी आलसी था, इसलिए उसका मालिक भी साथ-साथ चल रहा था ताकि उसे डंडे मारकर आगे बढ़ाता रहे।
दोपहर होते-होते सूरज सिर पर आ गया। चारों ओर दूर-दूर तक कोई पेड़ या छाया नहीं थी। थककर चूर यात्री ने आराम करने के लिए गधे को रोका और गधे की परछाई में दुबक कर बैठ गया।
अजीबोगरीब झगड़ा: परछाई किसकी?
गधे का मालिक भी गर्मी से बेहाल था। उसे यात्री को छाया में आराम करते देख ईर्ष्या हुई। वह यात्री से बोला— "भाई, ज़रा हटो! यह गधा मेरा है, इसलिए इसकी परछाई पर भी मेरा ही हक है। तुमने गधा किराए पर लिया है, उसकी परछाई नहीं।"
यात्री चिढ़कर बोला— "कैसी मूर्खतापूर्ण बात कर रहे हो? मैंने पूरे दिन के लिए गधा किराए पर लिया है, तो इसकी परछाई का इस्तेमाल करने का अधिकार भी मेरा ही है। तुम गधे और उसकी परछाई को अलग कैसे कर सकते हो?"
मूर्खता का परिणाम
बहस बढ़ती गई और देखते ही देखते दोनों के बीच हाथापाई और मारपीट शुरू हो गई। वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने और परछाई पर अधिकार जमाने में इतने अंधे हो गए कि उन्हें होश ही नहीं रहा कि गधा कहाँ है।
शोर-शराबे और मारपीट से घबराकर गधा वहाँ से सरपट भाग निकला। गधा भागा, तो उसके साथ उसकी परछाई भी चली गई। अब वे दोनों तपते मैदान में एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए। न बैठने को छाया बची और न आगे जाने के लिए गधा।
कहानी की सीख (The Moral)
"छोटी-छोटी बातों पर लड़ना अच्छा नहीं होता। आपसी झगड़ों में अक्सर हम उस अवसर या वस्तु को भी खो देते हैं, जिसका लाभ हम उठा सकते थे।"

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