"मधुमक्खी और कबूतर - पढ़िए यह सुंदर बोध कथा कि कैसे एक कबूतर ने मधुमक्खी की जान बचाई और समय आने पर मधुमक्खी ने अपना कर्ज चुकाया। (Moral Story on Helping Others)"
मधुमक्खी और कबूतर: कर भला, तो हो भला
क्या एक छोटी सी मधुमक्खी किसी पक्षी की जान बचा सकती है? यह कहानी हमें बताती है कि दया का कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। आइए जानते हैं कबूतर और मधुमक्खी की इस अनोखी दोस्ती के बारे में।
एक डूबती जान और कबूतर की दया
एक तपती दोपहर में, एक मधुमक्खी प्यास बुझाने के लिए तालाब के पास पहुँची। जैसे ही वह पानी पीने के लिए नीचे झुकी, उसका संतुलन बिगड़ गया और वह तालाब के ठंडे पानी में गिर गई। उसके नन्हे पंख गीले हो गए और वह लाख कोशिशों के बाद भी उड़ नहीं पा रही थी। उसकी मौत निश्चित लग रही थी।
तालाब के किनारे एक ऊँचे पेड़ पर एक कबूतर बैठा यह सब देख रहा था। उसे मधुमक्खी पर बहुत तरस आया। उसने तुरंत पेड़ से एक बड़ा पत्ता तोड़ा और उसे अपनी चोंच में दबाकर पानी में ठीक मधुमक्खी के पास गिरा दिया। मधुमक्खी धीरे से पत्ते पर चढ़ गई और सुरक्षित किनारे पर पहुँच गई। धूप में पंख सूखते ही उसने उड़ते हुए कबूतर को शुक्रिया कहा और अपनी राह चली गई।
संकट की घड़ी और मधुमक्खी का साहस
कुछ दिनों बाद, वही कबूतर दोपहर की नींद ले रहा था। वह इस बात से बिल्कुल अनजान था कि नीचे खड़ा एक शिकारी लड़का गुलेल से ठीक उसी पर निशाना साध रहा है। अगर निशाना लग जाता, तो कबूतर की जान चली जाती।
संयोग से वही मधुमक्खी पास से गुजर रही थी। उसने देखा कि उसका रक्षक मुसीबत में है। बिना एक पल की देरी किए, वह उड़कर लड़के के पास पहुँची और उसके हाथ पर जोर से डंक मार दिया।
भलाई का फल
दर्द के मारे लड़का चिल्ला उठा और उसके हाथ से गुलेल छूट गई। लड़के की चीख सुनकर कबूतर की नींद खुल गई और वह खतरा भांपकर तुरंत उड़ गया। जाते-जाते कबूतर ने उस नन्ही मधुमक्खी को दिल से धन्यवाद दिया। एक छोटे से पत्ते ने मधुमक्खी को बचाया था, और एक छोटे से डंक ने कबूतर की जान।
कहानी की सीख (The Moral)
"अच्छे लोग हमेशा दूसरों की मदद करते हैं और की गई भलाई कभी खाली नहीं जाती। 'कर भला, तो हो भला'—जब हम दूसरों का भला करते हैं, तो ईश्वर हमारी रक्षा का कोई न कोई रास्ता निकाल ही देता है।"
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