"टोपीवाला और बंदर - क्या टोपीवाला अपनी टोपियाँ वापस ले पाया? पढ़िए यह मजेदार कहानी जो सिखाती है कि बुद्धिबल शारीरिक बल से बड़ा होता है।"
टोपीवाला और बंदर: नकलची बंदरों को बुद्धि से मात
क्या आपने कभी किसी ऐसी मुसीबत का सामना किया है जहाँ ताकत नहीं, बल्कि दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ा हो? आइए जानते हैं एक चतुर टोपीवाले की कहानी, जिसने अपनी सूझबूझ से बंदरों को सबक सिखाया।
जंगल की सैर और मीठी नींद
एक टोपी बेचने वाला अपने संदूक में रंग-बिरंगी टोपियाँ लेकर एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहा था। रास्ते में एक घना जंगल पड़ता था। दोपहर का समय था और सूरज की तपिश तेज़ थी। चलते-चलते टोपीवाला बुरी तरह थक गया।
उसने एक ऊँचे और घने पेड़ की छाँव देखी, अपना संदूक नीचे रखा और वहीं सुस्ताने लगा। ठंडी हवा के झोंकों ने उसे ऐसी लोरी सुनाई कि उसे गहरी नींद आ गई। वह इस बात से बेखबर था कि उस पेड़ पर शरारती बंदरों की एक बड़ी टोली रहती थी।
बंदरों की शरारत
जब टोपीवाला सो रहा था, बंदर नीचे उतरे। उन्होंने संदूक खोला और रंगीन टोपियाँ देखकर बहुत खुश हुए। एक-एक करके सभी बंदरों ने टोपियाँ अपने सिर पर पहन लीं और वापस पेड़ पर चढ़ गए।
थोड़ी देर बाद जब टोपीवाले की आँख खुली, तो उसके होश उड़ गए। संदूक खाली था! उसने इधर-उधर देखा और फिर ऊपर की ओर नज़र दौड़ाई। उसने देखा कि सारे बंदर टोपियाँ पहनकर उसे चिढ़ा रहे थे।
नकल का जवाब अक्ल से
टोपीवाले को पहले तो बहुत गुस्सा आया। उसने जमीन से पत्थर उठाए और बंदरों की तरफ फेंके। बंदर तो नकलची होते हैं, उन्होंने भी बदले में पेड़ से फल तोड़कर टोपीवाले पर बरसाने शुरू कर दिए।
टोपीवाला समझ गया कि लड़कर टोपियाँ वापस नहीं मिलेंगी। उसे एक युक्ति सूझी। उसने अपनी सिर की टोपी उतारी और उसे जमीन पर फेंक दिया। बंदरों ने जैसे ही यह देखा, उन्होंने भी बिना सोचे-समझे अपनी टोपियाँ उतारीं और नीचे फेंक दीं।
टोपीवाले ने फुर्ती से सारी टोपियाँ समेटीं, उन्हें संदूक में भरा और मुस्कुराते हुए अपने रास्ते चल पड़ा।
कहानी की सीख (The Moral)
"सूझबूझ और बुद्धिमानी से ही हम कठिन से कठिन परिस्थितियों से पार पा सकते हैं। संकट के समय घबराने या गुस्सा करने के बजाय दिमाग का इस्तेमाल करना ही असली सफलता है।"
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