रहस्यमयी बस: आधी रात का डरावना सफर
प्रस्तावना (Introduction)
क्या आपने कभी ऐसी बस में सफर किया है जो दिखने में तो सामान्य हो, लेकिन उसके अंदर का सच आपकी रूह कंपा दे? तुषार के लिए वह बारिश वाली रात उसकी जिंदगी की सबसे डरावनी रात साबित होने वाली थी। चलिए पढ़ते हैं, "द मिस्ट्री ऑफ रूट नंबर 404"।
आखरी बस और मूसलाधार बारिश
बारिश की वजह से तुषार को ऑफिस से निकलने में देर हो गई थी। वह जानता था कि अगर आज की आखरी बस छूट गई, तो घर पहुंचना नामुमकिन होगा। वह गलियों से होता हुआ बस स्टॉप की ओर पागलों की तरह दौड़ा। किस्मत ने साथ दिया और ठीक उसी वक्त बस ने रफ्तार पकड़ी थी, जब तुषार उसमें चढ़ गया।
बस पूरी तरह खाली थी। तुषार ने राहत की सांस ली और खिड़की वाली अपनी पसंदीदा सीट पर जा बैठा। बाहर बिजली कड़क रही थी और ठंडी हवा के झोंके उसकी थकान मिटा रहे थे। "थोड़ी देर आंखें बंद कर लेता हूँ," उसने खुद से कहा और सो गया।
भीड़ का रहस्य: लोग आए और चले गए
महज दो मिनट बाद जब तुषार की आंख खुली, तो वह हक्का-बक्का रह गया। बस लोगों से खचाखच भरी थी! वह सोचने लगा, "अभी तो बस खाली थी, इतने लोग एक ही स्टॉप पर कैसे चढ़ गए?" लेकिन थकान इतनी थी कि उसने ज्यादा दिमाग नहीं लगाया और फिर से सो गया।
थोड़ी देर बाद जब दोबारा उसकी नींद टूटी, तो बस फिर से पूरी तरह खाली थी। कोई स्टॉप नहीं आया था, फिर वो भीड़ कहाँ गायब हो गई? तभी सन्नाटे को चीरती हुई बीड़ी की तीखी महक उसके नथुनों से टकराई।
बूढ़ा मुसाफिर और 30 साल पुराना राज
उसके बगल वाली सीट पर एक बूढ़ा आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और आँखें मानो अंधेरे को चीर रही हों।
"30 साल बेटा... 30 साल से मैं हर रात इसी बस में सफर करता हूँ," बूढ़े ने ठंडी आवाज में कहा। उसने बताया कि एक साल पहले इसी स्टॉप पर उसने एक ऐसे आदमी को देखा था जिसकी आँखें खाली थीं और जिसने फुसफुसाते हुए कहा था— "तू यहाँ नहीं होना चाहिए।" और फिर वह हवा में गायब हो गया। तुषार ने इसे एक सपना समझकर अनसुना कर दिया, लेकिन उसके मन में बेचैनी घर कर चुकी थी।
अखबार के पीछे छिपा खौफनाक चेहरा
5 मिनट बाद जब तुषार की आँख खुली, तो वह बूढ़ा गायब था। अब बस में उसके सामने एक दूसरा आदमी बैठा था, जो रात के 1 बजे अखबार पढ़ रहा था। उसका चेहरा अखबार के पीछे छिपा था।
तुषार ने घबराते हुए पूछा, "भाई साहब, आप कौन हैं?"
जैसे ही उस आदमी ने अखबार नीचे किया, तुषार की चीख निकल गई! उस आदमी का सिर आधा कुचला हुआ था और चेहरा खून से लथपथ था। उसकी आँखें बेजान थीं। डर के मारे तुषार ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन जब दोबारा आँख खोली, तो वह आदमी बिल्कुल साफ-सुथरा दिख रहा था और मुस्कुराते हुए उसे पानी ऑफर कर रहा था।
उसने तुषार से कहा, "यहाँ जो दिखता है, उसे भूल जाओ... वरना..."
बस का असली और डरावना रूप
वह आदमी अचानक चलती बस से कूद गया। तुषार बुरी तरह डर गया और अगले स्टॉप पर जैसे ही बस रुकी, वह बाहर की तरफ भागा। बारिश में भीगते हुए जब उसने मुड़कर पीछे देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह बस, जो अब तक चमक रही थी, अब पूरी तरह जली हुई और कबाड़ लग रही थी। जैसे बरसों पहले उसका एक्सीडेंट हुआ हो। खिड़कियों से वही बूढ़ा और वही अखबार वाला आदमी तुषार को देखकर मुस्कुरा रहे थे। बस धीरे-धीरे अंधेरे में ओझल हो गई, और तुषार स्टॉप पर अकेला खड़ा कांपता रह गया।

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