बेवकूफ शेर: लालच का कड़वा फल
क्या अधिक पाने की चाह में जो हाथ में है, उसे छोड़ देना बुद्धिमानी है? यह कहानी एक ऐसे शक्तिशाली शेर की है, जिसने अपने लालच के कारण एक आसान शिकार भी खो दिया और अंत में भूखा ही रह गया।
खरगोश का शिकार और शेर का लालच
एक विशाल जंगल में एक खूँखार शेर रहता था। एक दोपहर उसे भीषण भूख लगी, और वह शिकार की तलाश में अपनी गुफा से निकला। भटकते हुए उसकी नज़र एक पेड़ के नीचे खेल रहे एक नन्हे खरगोश पर पड़ी। शेर दबे पाँव आगे बढ़ा और अपनी फुर्ती दिखाते हुए उस खरगोश को दबोच लिया।
जैसे ही शेर उसे खाने वाला था, उसने देखा कि पास की झाड़ियों से एक हट्टा-कट्टा हिरन गुज़र रहा है। शेर के मन में लालच आ गया। उसने सोचा— "इस छोटे से खरगोश से मेरी भूख कहाँ मिटेगी? क्यों न मैं इस मोटे हिरन का शिकार करूँ, जिससे मेरा पेट भर जाए।"
हिरन का पीछा और असफलता
ज्यादा मांस के लालच में शेर ने पकड़े हुए खरगोश को आज़ाद कर दिया और पूरी ताकत लगाकर हिरन के पीछे दौड़ पड़ा। हिरन ने जैसे ही शेर को अपनी ओर आते देखा, उसने लंबी-लंबी छलाँगें लगानी शुरू कर दीं।
शेर हिरन के पीछे काफी दूर तक भागा, लेकिन हिरन बहुत तेज़ था और घने जंगल में ओझल हो गया। शेर दौड़ते-दौड़ते बुरी तरह थक गया और अंत में हार मानकर रुक गया।
हाथ आई खाली निराशा
थका-हारा शेर वापस उसी पेड़ के नीचे आया जहाँ उसने खरगोश को छोड़ा था। लेकिन तब तक खरगोश वहाँ से भागकर अपनी जान बचा चुका था। अब शेर के पास न हिरन था और न ही खरगोश। उसे अपनी मूर्खता और लालच पर बहुत पछतावा हुआ, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
कहानी की सीख (The Moral)
"आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे।"
भावार्थ: जो व्यक्ति उपलब्ध वस्तु से संतुष्ट न होकर अधिक के पीछे भागता है, वह अक्सर अपने पास मौजूद चीज़ को भी खो देता है। संतोष ही सबसे बड़ा सुख है।

0 Comments