"गरीब मोची और अमीर व्यापारी - क्या पैसा खुशी खरीद सकता है? जानिए कैसे 5000 रुपये ने एक मोची की रातों की नींद हराम कर दी।"
सुकून बनाम संपत्ति: जब पाँच हज़ार ने छीन ली मोची की मुस्कान
क्या पैसा सचमुच खुशी खरीद सकता है? एक हँसमुख मोची और एक बेचैन अमीर व्यापारी की यह कहानी 'सच्चे सुख' की एक नई परिभाषा हमारे सामने रखती है।
दो पड़ोसी: दो अलग दुनिया
एक गली में दो पड़ोसी रहते थे। एक था गरीब मोची, जो दिन भर जूते सीता और मस्ती में गीत गुनगुनाता। उसके घर के दरवाजे हमेशा खुले रहते और रात को वह बेफिक्र होकर सोता। दूसरी ओर उसका पड़ोसी, एक धनी व्यापारी था। उसके पास धन तो बहुत था, लेकिन सुकून नहीं। वह ईर्ष्या करता था कि एक मामूली मोची इतना खुश कैसे रह सकता है?
एक 'महंगा' उपहार
व्यापारी ने मोची की खुशी की परीक्षा लेने की सोची। उसने मोची को बुलाकर पाँच हजार रुपये दिए और कहा, "इन्हें रखो और अपनी मर्जी से खर्च करो, मुझे वापस नहीं चाहिए।" मोची ने इतने पैसे पहले कभी नहीं देखे थे। वह खुशी-खुशी पैसे लेकर घर आया।
चिंता का आगमन
जैसे ही धन घर आया, मोची का स्वभाव बदल गया।
उसने पहली बार अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कीं।
उसे डर लगने लगा कि कोई उसके पैसे चुरा न ले।
जो मोची रात भर घोड़े बेचकर सोता था, अब वह हर आहट पर जागने लगा।
उसके होठों से गीत और गुनगुनाहट गायब हो गई। उसे लगने लगा कि वह अपनी आज़ादी खो चुका है।
वापसी और शांति
अगली सुबह मोची सीधा व्यापारी के घर पहुँचा। उसने पाँच हजार रुपये व्यापारी के चरणों में रख दिए और हाथ जोड़कर कहा— "सेठजी, अपना यह बोझ वापस ले लीजिए। इन पैसों ने मेरा चैन, मेरी नींद और मेरे गीत छीन लिए हैं। मुझे मेरा पुराना 'गरीब' लेकिन 'सुकून भरा' जीवन वापस चाहिए।"
कहानी की सीख (The Moral)
"पैसे से हर प्रकार की खुशी प्राप्त नहीं की जा सकती।"
भावार्थ: धन भौतिक सुख-सुविधाएं तो दे सकता है, लेकिन मन की शांति और गहरी नींद एक सादगीपूर्ण और संतोषी जीवन से ही मिलती है।
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