मूर्खता का फल: बंदर की शरारत और टूटी पूँछ
क्या जिज्ञासा हमेशा अच्छी होती है? यह कहानी एक ऐसे बंदर की है, जिसकी बेमतलब की उत्सुकता ने उसे जीवन भर के लिए पछतावा दे दिया।
बढ़ई का काम और उत्सुक बंदर
एक समय की बात है, एक बढ़ई जंगल के पास लकड़ी का एक बहुत बड़ा लट्ठा चीर रहा था। उसे उस भारी लकड़ी के दो हिस्से करने थे। पास ही एक पेड़ पर बैठा एक बंदर बड़ी एकाग्रता से बढ़ई को काम करते देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि बढ़ई लकड़ी के साथ क्या कर रहा है।
दोपहर का समय हुआ, तो बढ़ई को भूख लगी। लकड़ी अभी आधी ही चिरी थी। बढ़ई ने सोचा कि वापस आकर काम यहीं से शुरू करेगा, इसलिए उसने दरार को खुला रखने के लिए उसमें एक मज़बूत लकड़ी की गुल्ली (खूँटा) फँसा दी और खाना खाने चला गया।
बिना सोचे-समझे दखलअंदाजी
बढ़ई के जाते ही बंदर पेड़ से नीचे उतर आया। वह सीधा लकड़ी के लट्ठे के पास पहुँचा। उसने देखा कि लकड़ी के बीच में कुछ फँसा हुआ है। बंदर उस लट्ठे के ऊपर चढ़कर बैठ गया, लेकिन उसने यह ध्यान नहीं दिया कि उसकी लंबी पूँछ लकड़ी की उसी दरार के बीच लटक रही है।
बंदर को उस गुल्ली के साथ खेलने की सूझी। उसने उसे हिलाना-डुलाना शुरू किया। उसे लगा कि यह कोई खिलौना है। उसने अपनी पूरी ताकत लगाई और एक झटके में उस गुल्ली को बाहर खींच लिया।
मूर्खता का भयानक अंत
जैसे ही गुल्ली बाहर निकली, लकड़ी के दोनों भारी हिस्से अपनी पुरानी जगह पर वापस आ गए और ज़ोर से आपस में चिपक गए। बंदर की पूँछ उसी दरार में बुरी तरह फँस गई।
दर्द के मारे बंदर की चीख निकल गई। वह छटपटाने लगा, लेकिन लकड़ी की पकड़ बहुत मज़बूत थी। उसे डर था कि कहीं बढ़ई न आ जाए। घबराहट और असहनीय पीड़ा में उसने एक ज़ोरदार छलांग लगाई, जिससे उसकी पूँछ टूटकर अलग हो गई। वह बंदर अब बिना पूँछ का हो गया था और अपनी मूर्खता पर रो रहा था।
कहानी की सीख (The Moral)
"अनजानी चीज़ों और दूसरों के काम में बिना मतलब की छेड़छाड़ करना खतरनाक होता है। जिस काम के बारे में पूरी जानकारी न हो, उसमें हाथ डालना अपनी मुसीबत को खुद निमंत्रण देना है।"

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