बंदर का इंसाफ: जब दो की लड़ाई में तीसरे ने मारी बाजी
क्या आपसी झगड़े का समाधान किसी तीसरे से करवाना हमेशा सही होता है? आइए जानते हैं उन दो बिल्लियों की कहानी, जिन्होंने एक केक के चक्कर में अपनी पूरी भूख ही गँवा दी।
एक केक और दो दावेदार
एक समय की बात है, दो बिल्लियों को सड़क पर एक ताज़ा और स्वादिष्ट केक मिला। जैसे ही केक दिखा, दोनों उस पर झपट पड़ीं।
पहली बिल्ली बोली, "इसे मैंने पहले उठाया है, इसलिए यह मेरा है!"
दूसरी बिल्ली गुर्राई, "पर देखा तो मैंने पहले था, तो हक तो मेरा बनता है!"
बात हाथपाई तक पहुँच गई। तभी वहाँ से एक चालाक बंदर गुजर रहा था। बिल्लियों को लगा कि बंदर बुद्धिमान है, इसलिए उन्होंने उसे अपना निर्णायक (Judge) चुन लिया।
बंदर की 'अनोखी' तराजू
बंदर ने बड़ी गंभीरता से केक हाथ में लिया और कहा, "फिक्र मत करो, मैं इसके दो बिल्कुल बराबर हिस्से कर दूँगा ताकि तुम दोनों को बराबर हिस्सा मिले।"
बंदर ने केक के दो टुकड़े किए और उन्हें गौर से देखा। फिर सिर हिलाते हुए बोला, "ओह! यह बायां टुकड़ा तो थोड़ा बड़ा है। रुको, इसे बराबर कर देता हूँ।" यह कहकर उसने बड़े टुकड़े से एक बड़ा हिस्सा खा लिया।
अब दायां हिस्सा बड़ा हो गया। बंदर ने फिर कहा, "अरे! अब यह बड़ा हो गया।" उसने उसमें से भी एक हिस्सा खा लिया।
इंसाफ का अंत: बिल्लियाँ रह गई खाली हाथ
बंदर यही खेल खेलता रहा—कभी बाएं से खाता, तो कभी दाएं से। बिल्लियाँ बेचारी टुकटुक देखती रह गईं और केक छोटा होता गया। अंत में, केक के बस दो नन्हे से टुकड़े बचे।
बंदर ने मुस्कराते हुए कहा, "अब भला इतने छोटे टुकड़े तुम्हें क्या दूँ? ये तो मेरी इंसाफ करने की मेहनत (Fees) है।" यह कहकर बंदर ने वे आखिरी टुकड़े भी अपने मुँह में डाल लिए और पेड़ पर चढ़ गया। बिल्लियाँ एक-दूसरे का मुँह ताकती रह गईं।
कहानी की सीख (The Moral)
"दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा होता है। आपसी विवादों को मिल-बैठकर सुलझा लेना ही बुद्धिमानी है, वरना कोई तीसरा आपकी फूट का लाभ उठाकर सब कुछ हड़प लेगा।"

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