"बुढ़िया और उसके नौकर - क्या मुर्गे को मारना नौकरों के लिए सही फैसला था? जानिए कैसे उनकी एक छोटी सी गलती ने उनकी रातों की नींद हराम कर दी।"
बुढ़िया और उसके नौकर: अदूरदर्शिता का परिणाम
क्या आपने कभी किसी छोटी समस्या से बचने के लिए कोई ऐसा काम किया है जो गले की फाँस बन गया हो? यह कहानी दो ऐसे नौकरों की है जिन्होंने अपनी नींद के चक्कर में अपना ही चैन खो दिया।
मालकिन की आदत और नौकरों की नींद
एक बुजुर्ग महिला के घर में दो नौकर काम करते थे। बुढ़िया बहुत ही अनुशासित थी। जैसे ही सुबह मुर्गा बाँग (कूकड़ूँ-कूँ) देता, बुढ़िया तुरंत उठ जाती और अपने नौकरों को भी नींद से जगाकर काम पर लगा देती।
नौकरों को सुबह की वह कच्ची नींद बहुत प्यारी थी। वे रोज़ सुबह जागते ही कुढ़ते और अपनी किस्मत को कोसते। उन्हें लगता कि उनकी नींद की असली दुश्मन मालकिन नहीं, बल्कि वह मुर्गा है जो समय पर चिल्लाने लगता है।
एक गलत योजना: न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी
एक दिन दोनों नौकरों ने मिलकर एक साज़िश रची। एक नौकर बोला, "भाई, क्यों न हम इस मुर्गे का ही काम तमाम कर दें? जब सुबह आवाज़ ही नहीं होगी, तो मालकिन जागेगी नहीं, और हम चैन से सूरज चढ़ने तक सो सकेंगे।"
दूसरे नौकर को यह सुझाव बहुत ही क्रांतिकारी लगा। अगले ही दिन मौका पाकर उन्होंने मुर्गे को मार डाला। उन्हें लगा कि अब उनके सुनहरे दिन आने वाले हैं।
पासा पड़ा उल्टा
मुर्गा तो मर गया, लेकिन नतीजा उनकी उम्मीद के बिल्कुल विपरीत निकला। अब बुढ़िया को डर सताने लगा कि कहीं वह सुबह देर तक न सोती रह जाए। समय का पता न चलने के कारण वह आधी रात के बाद ही जागने लगी।
अब बुढ़िया पहले से भी कहीं ज़्यादा जल्दी (ब्रह्म मुहूर्त में ही) नौकरों को उठाकर काम पर लगा देती। नौकर बेचारे अब पूरी रात भी ठीक से नहीं सो पाते थे। उन्होंने अपनी छोटी सी परेशानी से बचने के चक्कर में एक बड़ी मुसीबत मोल ले ली थी।
कहानी की सीख (The Moral)
"बिना बिचारे जो करे, सो पीछे पछताय। काम बिगारे आपनो, जग में होत हंसाय।"
भावार्थ: किसी भी काम को करने से पहले उसके दूरगामी परिणामों पर विचार करना बहुत ज़रूरी है। हड़बड़ी में लिया गया निर्णय अक्सर कष्टकारी होता है।
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