"सुगंध और खनखनाहट - क्या मिठाई की खुशबू लेने के पैसे देने पड़ते हैं? पढ़िए कैसे एक मजदूर ने लालची दुकानदार को उसी के तर्क से हराया।"
सुगंध और खनखनाहट: लालची दुकानदार और चतुर मजदूर
क्या किसी चीज़ की खुशबू लेना उसे खरीदने के बराबर है? यह कहानी एक ऐसे दुकानदार की है जिसने तर्क की मर्यादा लाँघ दी, और एक मजदूर की जिसने उसे उसी के जाल में फँसा दिया।
मिठाई की खुशबू और दुकानदार का लालच
एक गरीब मजदूर दिन भर खेतों में कड़ी मेहनत करने के बाद शाम को घर लौट रहा था। रास्ते में एक मिठाई की दुकान से ताज़ा मिठाइयों की मीठी-मीठी सुगंध आ रही थी। भूख और थकान की वजह से मजदूर के मुँह में पानी आ गया। वह कुछ देर दुकान के पास खड़ा होकर खुशबू का आनंद लेने लगा।
उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह मिठाई खरीद सके, इसलिए वह मन मारकर आगे बढ़ने लगा। तभी दुकानदार ने उसे पीछे से टोका— "अरे भाई! पैसे तो देते जाओ!"
मजदूर हैरान रह गया, "पैसे? किस बात के पैसे? मैंने तो कुछ खाया ही नहीं!"
दुकानदार ने कुतर्क करते हुए कहा, "तुमने मेरी मिठाई की सुगंध तो ली है न? सुगंध लेना मिठाई खाने के बराबर है, इसलिए तुम्हें पैसे तो देने ही पड़ेंगे।"
नहले पर दहला: होशियारी का जवाब
मजदूर घबरा गया, लेकिन वहीं खड़े एक समझदार व्यक्ति ने उसकी मदद की। उसने मजदूर के कान में एक तरकीब सुझाई। मजदूर मुस्कुराया और दुकानदार के पास जाकर अपनी जेब में रखे सिक्कों को ज़ोर-ज़ोर से खनखनाने लगा।
सिक्कों की खनखनाहट सुनकर दुकानदार के चेहरे पर चमक आ गई। उसने हाथ फैलाकर कहा, "लाओ, अब ये पैसे मुझे दो!"
मजदूर ने बड़ी शांति से जवाब दिया, "पैसे तो मैंने दे दिए!"
दुकानदार झल्लाकर बोला, "झूठ मत बोलो, तुमने मुझे एक ढेला भी नहीं दिया!"
मजदूर ने हंसते हुए कहा:
"सेठ जी! अगर मिठाई की 'सुगंध' लेना मिठाई खाने के बराबर है, तो सिक्कों की 'खनखनाहट' सुनना पैसे लेने के बराबर है। हिसाब बराबर हुआ!"
लालची दुकानदार की बोलती बंद हो गई और वह अपना सा मुँह लेकर रह गया। मजदूर शान से वहाँ से चला गया।
कहानी की सीख (The Moral)
"जैसे को तैसा (Tit for Tat)। अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए हमेशा शारीरिक बल की नहीं, बल्कि हाजिरजवाबी और बुद्धिमानी की ज़रूरत होती है।"
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