बैल और मेंढक: झूठा अभिमान और विनाश की कहानी
क्या किसी की बराबरी करने के चक्कर में हम अपना ही नुकसान कर बैठते हैं? यह कहानी एक ऐसी दादी मेंढक की है, जिसने अपनी असलियत भूलकर एक विशाल बैल की बराबरी करने की कोशिश की।
तालाब में एक विशाल मेहमान
एक शांत तालाब के किनारे नन्हे-नन्हे मेंढक मजे से उछल-कूद कर रहे थे। तभी वहाँ एक विशालकाय बैल पानी पीने पहुँचा। पानी पीने के बाद बैल ने एक बहुत ज़ोरदार और गहरी डकार ली। उस भयंकर आवाज़ और बैल के विशाल शरीर को देखकर नन्हे मेंढक बुरी तरह डर गए और भागते हुए अपनी दादी के पास पहुँचे।
दादी का अहंकार और दिखावा
दादी मेंढक ने घबराए हुए बच्चों से पूछा, "क्या हुआ बच्चों? तुम सब ऐसे डरे हुए क्यों हो?"
नन्हे मेंढक ने हाफते हुए कहा, "दादी! हमने अभी तालाब पर एक बहुत ही विशाल और डरावना जानवर देखा। उसकी आवाज़ तो बादलों के गरजने जैसी थी!"
दादी मेंढक को अपनी विशालता पर बड़ा घमंड था। उसने अपने पैर फैलाए, थोड़ा सा सांस भरकर अपना शरीर फुलाया और पूछा, "क्या वह इतना बड़ा था?"
नन्हे मेंढक ने सिर हिलाते हुए कहा, "नहीं दादी! वह तो इससे बहुत, बहुत बड़ा था।"
एक घातक मुकाबला
दादी मेंढक को यह बात चुभ गई कि कोई उससे भी बड़ा कैसे हो सकता है। उसने और ज़्यादा हवा भरी और अपने पेट को गुब्बारे की तरह फुला लिया। उसने फिर पूछा, "अब बताओ, क्या वह इससे भी बड़ा था?"
पोते ने फिर वही जवाब दिया, "दादी, वह तो एक पहाड़ जैसा था, आप उसके सामने कुछ भी नहीं!"
अब दादी मेंढक जिद पर अड़ गई। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर इतनी हवा भरी कि उसका शरीर अपनी क्षमता से बाहर खिंच गया। वह बैल के बराबर दिखने की चाह में खुद को फुलाती ही गई... और अचानक, "धड़ाक!" की आवाज़ के साथ उसका पेट फट गया और उसकी जान चली गई।
कहानी की सीख (The Moral)
"थोथा अभिमान और झूठी प्रतिष्ठा के लिए अपनी क्षमता से बाहर जाकर दिखावा करना विनाश का कारण बनता है। हमें अपनी असलियत स्वीकार करनी चाहिए और दूसरों की अंधी नकल नहीं करनी चाहिए।"

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