"खरगोश और उसके मित्र - क्या खरगोश के इतने सारे दोस्त उसे शिकारी कुत्तों से बचा पाए? पढ़िए यह भावुक कहानी जो हमें स्वार्थी लोगों से सावधान करती है।"
खरगोश और उसके स्वार्थी मित्र: भीड़ में भी अकेला
क्या बहुत सारे मित्र होना इस बात की गारंटी है कि संकट में कोई आपके साथ खड़ा होगा? यह कहानी एक ऐसे खरगोश की है जिसके पास मित्रों की लंबी सूची थी, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर एक भी हाथ उसकी मदद के लिए नहीं उठा।
संकट और उम्मीद की पुकार
एक प्यारा खरगोश जंगल में रहता था जिसे अपनी 'दोस्ती' पर बहुत नाज़ था। एक दिन शिकारी कुत्तों के झुंड ने उसका पीछा करना शुरू किया। खरगोश जान बचाकर भागा और थककर एक झाड़ी में छिप गया। उसने सोचा, "मेरे तो इतने मित्र हैं, कोई न कोई तो मेरी जान बचा ही लेगा।"
एक-एक कर टूटती उम्मीदें
खरगोश ने रास्ते से गुज़रते अपने हर 'मित्र' से मदद की गुहार लगाई, लेकिन उसे केवल खोखले बहाने मिले:
घोड़ा: "मैं बहुत जल्दी में हूँ, तुम बैल से मदद मांग लो।"
बैल: "मेरे दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहे हैं, तुम बकरे से कहो।"
बकरा: "मेरी पीठ बहुत खुरदरी है, तुम्हें चोट लग जाएगी, तुम भेड़ से पूछो।"
भेड़: "शिकारी कुत्ते मुझे भी नुकसान पहुँचा सकते हैं, मुझे माफ करो।"
खरगोश के जितने भी पुराने और 'करीबी' मित्र थे, सबने कोई न कोई तर्क देकर अपना रास्ता नाप लिया। जिसे वह अपना सुरक्षा कवच समझता था, वह ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
दुखद अंत और कड़वा सबक
अंत में, खरगोश को अहसास हुआ कि अच्छे दिनों में गपशप करने वाले साथी और संकट में ढाल बनने वाले मित्र अलग-अलग होते हैं। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। शिकारी कुत्तों ने उसे ढूँढ़ निकाला और वह नन्हा जीव अपने 'मित्रों' की भीड़ के बावजूद बेमौत मारा गया।
कहानी की सीख (The Moral)
"स्वार्थी मित्र पर विश्वास करने से सर्वनाश ही होता है।"
भावार्थ: मित्रों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है, उनकी निष्ठा (Loyalty) महत्वपूर्ण है। सौ स्वार्थी मित्रों से बेहतर एक ऐसा सच्चा मित्र है जो वक्त आने पर आपका साथ न छोड़े।
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