"असली माँ - जब एक बच्चे के लिए दो स्त्रियाँ लड़ीं, तो न्यायाधीश ने बच्चे के दो टुकड़े करने का आदेश क्यों दिया? पढ़िए न्याय और ममता की यह अद्भुत कहानी।"
असली माँ: ममता और न्याय की एक कालजयी कहानी
क्या कोई माँ अपने बच्चे को किसी और को सौंप सकती है? हाँ, यदि उस बच्चे की जान खतरे में हो। राजा सोलोमन के न्याय से प्रेरित यह कहानी बताती है कि भावनाओं की परीक्षा कैसे सत्य को उजागर कर देती है।
एक बच्चा और दो दावेदार
एक बार दरबार में दो महिलाएँ एक नन्हे बालक को लेकर पहुँचीं। दोनों का दावा एक ही था— "यह मेरा बच्चा है!" शहर के लोग और दरबारी इस उलझन में थे कि दोनों में से कौन सच बोल रही है और कौन झूठ, क्योंकि दोनों ही पूरे हक से रो-रोकर अपनी बात कह रही थीं।
न्यायाधीश का कठोर फैसला
जब कोई गवाह नहीं मिला, तो चतुर न्यायाधीश ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। उन्होंने कहा— "चूँकि तुम दोनों इस बच्चे पर अपना हक जता रही हो और कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए न्याय की खातिर इस बच्चे के दो टुकड़े कर दिए जाएँ। आधा हिस्सा पहली महिला को मिले और आधा दूसरी को।"
ममता का आत्मसमर्पण बनाम स्वार्थ का सन्नाटा
जैसे ही जल्लाद तलवार लेकर आगे बढ़ा, पहली महिला चीख पड़ी और न्यायाधीश के पैरों में गिर गई। वह हाथ जोड़कर रोते हुए बोली—
"नहीं सरकार! मेरे बच्चे के टुकड़े मत कीजिए। मैं अपना दावा वापस लेती हूँ। यह बच्चा दूसरी महिला को ही दे दीजिए, कम से कम मेरा लाल जीवित तो रहेगा!"
वहीं दूसरी महिला चुपचाप खड़ी रही। उसके चेहरे पर बच्चे की जान जाने का कोई दुख नहीं था, उसे बस अपना आधा हिस्सा मिलने की तसल्ली थी।
सत्य की विजय
न्यायाधीश तुरंत समझ गए कि असली माँ कौन है। उन्होंने आदेश दिया— "बच्चा उस पहली महिला को सौंप दिया जाए, क्योंकि केवल एक असली माँ ही अपने बच्चे की जान बचाने के लिए उसे छोड़ने का दुख सह सकती है।" दूसरी महिला को उसकी क्रूरता और झूठ के लिए दंडित किया गया।
कहानी की सीख (The Moral)
"सच्चाई की सदा विजय होती है।"
भावार्थ: सत्य को छिपाने के लिए हज़ारों झूठ बोले जा सकते हैं, लेकिन त्याग और ममता के सामने असत्य कभी नहीं टिक सकता।
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