भेड़िया और सारस: धूर्त की दोस्ती का परिणाम
क्या दुष्ट व्यक्ति कभी अपनी प्रकृति बदल सकता है? यह कहानी एक उदार सारस और एक एहसानफरामोश भेड़िये की है, जो हमें सिखाती है कि हर किसी पर भरोसा करना भारी पड़ सकता है।
भेड़िये का संकट
एक समय की बात है, एक लालची भेड़िया बड़े चाव से मांस खा रहा था। हड़बड़ी और लालच में उसने एक बड़ा टुकड़ा निगल लिया, जिसके साथ एक नुकीली हड्डी उसके गले में जाकर फँस गई। भेड़िये ने उसे निकालने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह हड्डी टस से मस नहीं हुई।
भेड़िया दर्द से तड़पने लगा। उसे लगा कि अब वह कुछ खा-पी नहीं पाएगा और भूख से उसकी मौत हो जाएगी। वह मदद के लिए इधर-उधर भटकने लगा।
सारस की उदारता
तभी उसकी नज़र नदी के किनारे खड़े एक लंबी गर्दन वाले सारस पर पड़ी। भेड़िया मिन्नतें करते हुए बोला— "सारस भाई! मेरी जान बचा लो। मेरे गले में एक हड्डी फँस गई है। तुम्हारी गर्दन लंबी है, तुम आसानी से उसे निकाल सकते हो। अगर तुम मेरी मदद करोगे, तो मैं तुम्हें बहुत बड़ा इनाम दूँगा।"
भोले सारस को भेड़िये पर दया आ गई। उसने भेड़िये को अपना मुँह खोलने को कहा। सारस ने अपनी लंबी चोंच और गर्दन भेड़िये के खूँखार जबड़ों के अंदर डाली और बड़ी सावधानी से हड्डी को बाहर खींच लिया।
धूर्तता का असली चेहरा
हड्डी निकलते ही भेड़िये को चैन मिला। सारस ने नम्रता से पूछा— "भेड़िये भाई, अब मेरा इनाम कहाँ है?"
भेड़िया कुटिलता से हँसा और बोला— "इनाम? कैसा इनाम? ओ मूर्ख सारस! तुमने एक शिकारी भेड़िये के मुँह में अपनी गर्दन डाली थी और वह सही-सलामत बाहर निकल आई, क्या यह किसी इनाम से कम है? चुपचाप यहाँ से चले जाओ, वरना अगला शिकार तुम ही होगे।"
सारस को अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसने एक धूर्त की मदद की थी जो उपकार मानना नहीं जानता।
कहानी की सीख (The Moral)
"धूर्त और दुष्ट व्यक्ति के साथ कभी मित्रता या सौदा नहीं करना चाहिए। वे अपना काम निकल जाने के बाद एहसान भुलाने में एक पल की भी देरी नहीं करते।"

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