"भेड़ के वेष में भेड़िया - क्या भेड़िए की चालाकी काम आई? जानिए कैसे एक भेड़ की खाल ओढ़ना भेड़िए की अपनी मौत का कारण बन गया।"
भेड़ के वेष में भेड़िया: जब छल खुद पर भारी पड़ा
क्या कोई रूप बदलकर कुदरत के न्याय से बच सकता है? भेड़ की खाल ओढ़े इस भेड़िए की कहानी हमें चेतावनी देती है कि बुरी नीयत का फल कभी न कभी बुरा ही होता है।
भेड़िए की धूर्त योजना
एक भूखे भेड़िए को कहीं से भेड़ की खाल मिल गई। उसे एक तरकीब सूझी— उसने वह खाल अपने ऊपर ओढ़ ली और भेड़ों के झुंड में घुल-मिल गया। गड़रिया भी उसे नहीं पहचान पाया। भेड़िए ने मन ही मन सोचा— "वाह! आज तो दावत होगी। रात को जब गड़रिया सबको बाड़े में बंद कर देगा, तब मैं अंधेरे का फायदा उठाकर किसी मोटी भेड़ का शिकार करूँगा और चुपके से भाग जाऊँगा।"
योजना और अनहोनी
सूरज ढलते ही गड़रिए ने सभी भेड़ों को बाड़े में बंद कर दिया। भेड़िया अपनी सफलता पर बेहद खुश था। वह बस सही मौके का इंतज़ार कर रहा था। लेकिन तभी एक ऐसी घटना घटी जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
उसी रात गड़रिए के घर कुछ मेहमान आए थे। गड़रिए ने अपने नौकर को आदेश दिया— "बाड़े में जाओ और रात के भोजन के लिए सबसे तगड़ी और मोटी भेड़ को चुनकर लाओ।"
करनी का फल
नौकर अंधेरे बाड़े में घुसा। उसे सबसे मोटा और तगड़ा 'जानवर' वही भेड़िया लगा जिसने भेड़ की खाल पहनी थी। नौकर ने बिना जाँच किए उसे उठाया और रसोई में ले जाकर हलाल कर दिया। भेड़िया जो दूसरों का शिकार करने आया था, अपनी ही धूर्तता के कारण खुद गड़रिए और उसके मेहमानों का आहार बन गया।
कहानी की सीख (The Moral)
"बुरा सोचने वाले का अंत बुरा ही होता है।"
भावार्थ: दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए अपनाया गया छल अंततः स्वयं के विनाश का कारण बनता है। ईमानदारी का रास्ता ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।
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