जादुई घड़ा और किसान माधव
किसी दूर गांव में माधव नाम का एक किसान रहता था। माधव बहुत ही सीधा और मेहनती इंसान था। उसके पास पाँच एकड़ ज़मीन थी, लेकिन वह ज़मीन बंजर थी और उस पर एक दाना भी नहीं उगता था। गाँव के लोग उसे अक्सर टोकते, "माधव, क्यों इस पथरीली ज़मीन पर अपना पसीना बहा रहे हो? इसे बेच दो और कहीं और ज़मीन ले लो।"
पर माधव मुस्कुरा कर कहता, "यह मेरे पुरखों की निशानी है, मैं इसे नहीं छोड़ सकता। शायद मेरी मेहनत में ही कोई कमी है, पर मैं कोशिश जारी रखूंगा।"
जादुई घड़े की खोज
एक दिन चिलचिलाती धूप में खेत खोदते समय माधव की कुदाल किसी धातु की चीज़ से टकराई। माधव ने मिट्टी हटाई तो वहां एक बहुत बड़ा धातु का घड़ा निकला। माधव को लगा कि यह किसी काम का नहीं है, उसने अपनी पुरानी कुदाल उस घड़े में डाल दी और थक कर पेड़ की छांव में बैठ गया।
शाम को जब वह अपनी कुदाल लेने वापस आया, तो उसकी आँखें फटी रह गईं। घड़े के अंदर एक नहीं, बल्कि सौ कुदालें चमक रही थीं! माधव समझ गया कि यह कोई साधारण घड़ा नहीं, बल्कि एक जादुई घड़ा है। उसने एक अंगूर का दाना उसमें डाला, तो तुरंत वह सौ अंगूरों से भर गया। माधव खुशी-खुशी उसे रस्सी से बांधकर अपने घर ले आया।
खुशहाली और गाँव की हैरानी
माधव ने धीरे-धीरे उस घड़े का इस्तेमाल अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए किया। उसे अंडे खाने थे, उसने एक अंडा डाला और घड़ा अंडों से भर गया। उसे कपड़ों की ज़रूरत थी, उसने एक कपड़ा डाला और उसे ढेर सारे कपड़े मिल गए। जल्द ही माधव की गरीबी दूर हो गई।
गाँव वाले हैरान थे कि बंजर ज़मीन वाला माधव अचानक इतना अमीर कैसे हो गया? पर माधव ने यह राज़ सबसे छुपा कर रखा था।
एक छोटी सी भूल
एक रात माधव ने घड़े की परीक्षा लेने के लिए उसमें एक मुर्गी डाल दी। बस फिर क्या था! पलक झपकते ही घड़े से सैकड़ों मुर्गियां फड़फड़ाती हुई बाहर आने लगीं। पूरा घर मुर्गियों से भर गया। वे मेज़ पर, सोफे पर और यहाँ तक कि माधव के सिर पर बैठने लगीं। मुर्गियों को भगाने के चक्कर में एक मुर्गी फिर से घड़े में गिर गई और फिर सौ मुर्गियां और बाहर आ गईं। माधव परेशान होकर घर से बाहर भागा और मुर्गियां भी उसके पीछे भागने लगीं।
राजा का लालच
माधव की यह बात राजा के एक सिपाही ने सुन ली और राजा को जादुई घड़े की खबर दे दी। राजा बहुत ही लालची था। उसने माधव को बुलवाया और कहा, "वह घड़ा शाही खजाने की संपत्ति है, उसे तुरंत यहाँ पेश करो।"
माधव को विवश होकर घड़ा दरबार में लाना पड़ा। राजा ने घड़े को देखा और उत्सुकता से कहा, "देखूँ तो सही, इसके अंदर ऐसा क्या है जो सब कुछ सौ गुना कर देता है!"
जैसे ही लालची राजा ने घड़े के अंदर झाँका, उसका पैर फिसल गया और वह सीधे घड़े के अंदर गिर गया। अब घड़े का जादू शुरू हुआ—अंदर से एक नहीं, सौ राजा बाहर निकलने लगे!
अहंकार का अंत
दरबार में सौ राजा हो गए और हर कोई चिल्लाने लगा, "मैं असली राजा हूँ! तुम सब नकली हो!" वे आपस में ही तलवारें निकाल कर लड़ने लगे। इस झगड़े में राजाओं का अंत हो गया और पूरा राजमहल शोक में डूब गया।
माधव को एहसास हुआ कि इस जादुई घड़े ने गाँव में शांति की जगह अशांति फैला दी है। वह चुपचाप घड़ा लेकर अपने खेत पर आया और उसे पत्थर पर पटक कर तोड़ दिया।
अंत में: जादुई घड़ा टूटने के बाद माधव ने फिर से अपनी मेहनत पर भरोसा किया। चमत्कार से उसकी वह बंजर ज़मीन अब हरी-भरी फसल से लहलहाने लगी थी। माधव ने अपनी मेहनत से खेती शुरू की और एक संतुष्ट और सुखी जीवन जीने लगा।

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